रहस्यपूर्ण चिठ्ठी ][ ३५१
मतिज्ञान – श्रुतज्ञान तो परोक्ष प्रमाण छे; अवधि, मनःपर्यय अने केवलज्ञान प्रत्यक्ष प्रमाण
छे. यथाः — ‘‘आद्ये परोक्षं, प्रत्यक्षमन्यत्’’ (तत्त्वार्थ सूत्र अ. १, सू. ११ – १२) एवुं सूत्रनुं वचन
छे. तेम ज तर्कशास्त्रमां प्रत्यक्ष – परोक्षनुं आवुं लक्षण कह्युं छेः — ‘‘स्पष्टप्रतिभासात्मकं प्रत्यक्षमस्पष्टं
परोक्षम्’’।
जे ज्ञान पोताना विषयने सारी रीते निर्मळरूपे स्पष्ट जाणे ते प्रत्यक्ष छे, अने जे
ज्ञान सारी रीते स्पष्ट न जाणे ते परोक्ष छे; त्यां मतिज्ञान – श्रुतज्ञानना विषय तो घणा छे
परंतु एक पण ज्ञेयने संपूर्ण जाणी शकतां नथी तेथी ते परोक्ष छे. अवधि – मनःपर्यायज्ञाननो
विषय थोडो छे तथापि ते पोताना विषयने स्पष्ट सारी रीते जाणे छे तेथी ते एकदेशप्रत्यक्ष
छे, अने केवळज्ञान सर्व ज्ञेयने पोते स्पष्ट जाणे छे तेथी सर्वप्रत्यक्ष छे.
वळी प्रत्यक्षना बे भेद छे – एक परमार्थ प्रत्यक्ष अने बीजो सांव्यवहारिक प्रत्यक्ष.
अवधि, मनःपर्यय अने केवळज्ञान तो स्पष्ट प्रतिभासरूप छे ज तेथी पारमार्थिक प्रत्यक्ष छे,
अने नेत्रादिवडे वर्णादिने जाणे छे, त्यां व्यवहारथी एवुं कहेवामां आवे छे के ‘तेणे वर्णादिक
प्रत्यक्ष जाण्या,’ एकदेश निर्मळता पण होय छे तेथी तेने सांव्यवहारिक प्रत्यक्ष कहे छे; परंतु
जो एक वस्तुमां अनेक मिश्र वर्ण छे ते नेत्र द्वारा सारी रीते ग्रह्या जता नथी तेथी तेने
परमार्थ प्रत्यक्ष कहेवामां आवतुं नथी.
वळी परोक्ष प्रमाणना पांच भेद छेः — स्मृति, प्रत्यभिज्ञान, तर्क, अनुमान अने
आगम. तेनुं स्वरूपः — १. पूर्वे जाणेली वस्तुने याद करीने जाणवी तेने स्मृति कहे छे,
२. द्रष्टांतवडे वस्तुनो निश्चय करीए तेने प्रत्यभिज्ञान कहे छे, ३. हेतुना विचारयुक्त जे ज्ञान
तेने तर्क कहे छे, ४. हेतुथी साध्य वस्तुनुं जे ज्ञान तेने अनुमान कहे छे, तथा ५. आगमथी
जे ज्ञान थाय तेने आगम कहे छे.
ए प्रमाणे प्रत्यक्ष – परोक्ष प्रमाणना भेद कह्या छे.
त्यां आ स्वानुभवदशामां आत्माने जाणीए ते श्रुतज्ञानवडे जाणवामां आवे छे. श्रुतज्ञान
मतिज्ञानपूर्वक ज छे, ते मतिज्ञान – श्रुतज्ञान परोक्ष कहेल छे तेथी त्यां आत्मानुं जाणवुं प्रत्यक्ष
होतुं नथी. वळी अवधि – मनःपर्ययनो विषय रूपी पदार्थो ज छे; तथा केवळज्ञान छद्मस्थने छे
नहि, तेथी अनुभवमां केवळज्ञान वा अवधि – मनःपर्ययवडे आत्मानुं जाणवुं नथी. वळी अहीं
आत्माने स्पष्ट सारी रीते जाणतो नथी तेथी पारमार्थिक प्रत्यक्षपणुं तो संभवतुं नथी.
तथा जेम नेत्रादिवडे वर्णादिक जाणवामां आवे छे तेम एकदेश निर्मळतासहित पण
आत्माना असंख्यात प्रदेशादि जाणवामां आवता नथी तेथी सांव्यवहारिक प्रत्यक्षपणुं पण
संभवतुं नथी.
अहीं तो आगम – अनुमानादिक परोक्ष ज्ञानवडे आत्मानो अनुभव होय छे.