परमार्थवचनिका ][ ३६१
परसत्तावलंबक छे (पण तेने ते मोक्षमार्ग कहेतो नथी) ते आत्मा परसत्तावलंबी ज्ञानने
परमार्थता कहेतो नथी.
जे ज्ञान होय ते स्वसत्तावलंबनशील होय तेनुं नाम ज्ञान. ते ज्ञानने सहकारभूत
निमित्तरूप नानाप्रकारना औदयिकभाव होय छे. ते औदयिकभावनो ज्ञाता, तमाशगीर छे पण
तेनो कर्ता, भोक्ता के अवलंबी नथी; तेथी कोई एम कहे के – ‘आ प्रकारना औदयिकभाव सर्वथा
होय तो तेने अमुक (फलाणुं) गुणस्थान कहीए’ — एम कहेवुं ए जूठ छे. एम कहेनारे द्रव्यनुं
स्वरूप सर्वथा प्रकारे जाण्युं नथी.
कारण – अन्य गुणस्थाननी तो वात शुं कहेवी? केवळीओने पण औदयिकभावोनुं
अनेकप्रकारपणुं जाणवुं. केवळीओने पण औदयिकभाव एकसरखा होय नहि; कोई केवळीने
दंड – कपाटरूप क्रियानो उदय होय त्यारे कोई केवळीने ते न होय. ए प्रमाणे केवळीओमां पण
उदयनी अनेकरूपता छे तो अन्य गुणस्थानोनी तो वात शुं कहेवी?
माटे औदयिकभावोना भरोसे ज्ञान नथी. ज्ञान स्वशक्तिप्रमाण छे. स्व – परप्रकाशक ज्ञाननी
शक्ति, ज्ञायकप्रमाण ज्ञान, स्वरूपाचरण चारित्र यथानुभवप्रमाण – ए ज्ञातानुं सामर्थ्य छे.
ए वातनुं विवेचन क्यांसुधी लखीए, क्यांसुधी कहीए? (तत्त्व) वचनातीत, इंद्रियातीत,
ज्ञानातीत छे तेथी आ विचारो बहु शा लखवा? जे ज्ञाता हशे ते थोडुं लखेलुं (पण) बहु
समजशे. जे अज्ञानी हशे ते आ चिठ्ठी सांभळशे खरो, परंतु समजशे नहि. आ वचनिका
जेम छे तेम – (यथायोग्य) – सुमतिप्रमाण केवळीवचनानुसार छे. जे जीव आ सांभळशे, समजशे,
श्रद्धशे, तेने कल्याणकारी छे – भाग्यप्रमाण.
इति परमार्थ वचनिका
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