३६० ][ मोक्षमार्गप्रकाशक
हवे त्रीजो विभ्रमवाळो पुरुष बोल्यो के आ तो प्रत्यक्षप्रमाण रूपुं छे, आने छीप कोण कहे
छे? मारी द्रष्टिमां तो रूपुं सूजे छे, तेथी सर्वथा प्रकारे ते रूपुं छे. ते त्रणे पुरुषोए तो
छीपना स्वरूपने जाण्युं नहि, तेथी ए त्रणे मिथ्यावादी छे. हवे चोथो पुरुष बोल्यो के —
आ तो प्रत्यक्षप्रमाण छीपना खंड छे तेमां संशय शो? छीप, छीप, छीप, निर्धार छीप. जो
आने कोई अन्य वस्तु कहे तो ते प्रत्यक्षप्रमाण भ्रमित वा अंध. तेवी रीते सम्यग्द्रष्टिने स्व-
पर स्वरूपमां संशय, विमोह, विभ्रम नथी, यथार्थ द्रष्टि छे; तेथी सम्यग्द्रष्टि जीव अंतर्द्रष्टिवडे
मोक्षपद्धति साधी जाणे छे. ते बाह्यभावने बाह्यनिमित्तरूप माने छे; ते निमित्त तो
नानाप्रकारनां छे एकरूप नथी; तेथी अंतर्द्रष्टिना प्रमाणमां मोक्षमार्ग साधे छे. सम्यग्ज्ञान
(स्वसंवेदन) अने स्वरूपाचरणनी कणिका जाग्ये मोक्षमार्ग साचो.
मोक्षमार्ग साधवो ए व्यवहार अने शुद्धद्रव्य अक्रियारूप ते निश्चय छे. ए प्रमाणे
निश्चय – व्यवहारनुं स्वरूप सम्यग्द्रष्टि जाणे छे; पण मूढ जीव जाणे नहि अने माने पण नहि.
मूढ जीव बंधपद्धतिने साधतो थको तेने मोक्षमार्ग कहे ते वात ज्ञाता माने नहि.
केमके बंधने साधवाथी बंध सधाय पण मोक्ष सधाय नहि. ज्ञाता ज्यारे कदाचित्
बंधपद्धतिनो विचार करे त्यारे ते जाणे के आ पद्धतिथी मारुं द्रव्य अनादिनुं बंधरूप चाल्युं
छे, हवे ए पद्धतिथी मोह तोडी वर्तुं; आ पद्धतिनो राग पूर्वनी जेम हे नर! तुं शा माटे
करे छे? ते क्षणमात्र पण बंधपद्धतिमां मग्न थाय नहि. ते ज्ञाता पोतानुं स्वरूप विचारे,
अनुभवे, ध्यावे, गावे श्रवण करे तथा नवधाभक्ति, तप, क्रिया पोताना शुद्धस्वरूपसन्मुख थईने
करे, ए ज्ञातानो आचार छे. एनुं नाम मिश्रव्यहार छे. हवे —
हेय – ज्ञेय – उपादेयरुप ज्ञातानी चालनो विचार
हेय — त्यागरूप तो पोताना द्रव्यनी अशुद्धता, ज्ञेय — विचाररूप अन्य षट्द्रव्य स्वरूप
उपादेय — आचरणरूप पोताना द्रव्यनी शुद्धता. तेनुं विवेचनः — गुणस्थानकना प्रमाणमां हेय-
ज्ञेय-उपादेयरूप शक्ति ज्ञातानी होय. जेम जेम ज्ञातानी हेय-ज्ञेय-उपादेयरूप शक्ति वर्धमान
थती जाय तेम तेम गुणस्थाननी वृद्धि थाय एम कह्युं छे.
गुणस्थान प्रमाणे ज्ञान अने गुणस्थान प्रमाणे क्रिया. तेमां विशेष एटलुं के एक
गुणस्थानवर्ती अनेक जीव होय तो (तेमने) अनेकरूपनुं ज्ञान तथा अनेकरूपनी क्रिया कहेवामां
आवे छे. कारण के भिन्न – भिन्न सत्ताना प्रमाणे करी (ज्ञान – क्रियामां) एकता मळे नहि. एकेक
जीवद्रव्यमां अन्यान्यरूप औदयिकभाव होय, ते औदयिकभावानुसार ज्ञाननी पण अन्य –
अन्यता जाणवी.
परंतु विशेष एटलुं के (ए सर्व आत्मामां) कोई प्रकारनुं ज्ञान एवुं न होय के
परसत्तावलंबनशील बनी मोक्षमार्ग साक्षात् कहे! केमके अवस्था (दशा)ना प्रमाणमां