उपादान-निमित्तनी चिठ्ठी ][ ३६५
संक्लेशताथी अशुभ बंध; ए तो हुं पण मानुं छुं. परंतु एमां बीजो भेद छे ते सांभळ —
अशुभपद्धति अधोगतिनुं परिणमन छे तथा शुभपद्धति ऊर्ध्वगतिनुं परिणमन छे; तेथी अधोरूप
संसार अने ऊर्ध्वरूप मोक्षस्थान छे एम स्वीकार तेमां शुद्धता आवी एम मान, मान एमां
नुकसान नथी. विशुद्धता सदाकाळ मोक्षनो मार्ग छे, परंतु ग्रंथिभेद विना शुद्धतानुं जोर चालतुं
नथी ने?
जेम कोई पुरुष नदीमां डूबकी मारे, फरी ऊछळे त्यारे दैवयोगे ते पुरुषनी उपर नौका
आवी जाय तो जोके ते पुरुष तारो (तरनारो) छे तोपण केवी रीते नीकळे? तेनुं जोर चाले
नहि; घणो कलबल करे पण कांई वश चालतुं नथी. आम विशुद्धतानी पण ऊर्ध्वता जाणवी;
ते माटे गर्भित शुद्धता कही. ग्रंथिभेद थतां ए गर्भित शुद्धता मोक्षमार्ग तरफ चाली, पोताना
स्वभाववडे वर्धमानरूप थई त्यारे ते पूर्ण यथाख्यातरूप प्रगट कहेवाई. विशुद्धतानी पण जे
ऊर्ध्वता ए ज तेनी शुद्धता.
अने सांभळ — ज्यां मोक्षमार्ग साध्यो त्यां कह्युं के — ‘सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राणिमोक्षमार्गः’
तथा एम पण कह्युं छे के ‘ज्ञानक्रियाभ्याम् मोक्षः’।
ते संबंधी विचारः — चोथा गुणस्थानथी मांडी चौदमा गुणस्थानपर्यंत मोक्षमार्ग कह्यो
तेनुं विवरण — सम्यक्रूप ज्ञानधारा, विशुद्धरूप चारित्रधारा — ए बन्ने धारा मोक्षमार्ग तरफ
चाली, त्यां ज्ञानवडे ज्ञाननी शुद्धता अने क्रियावडे क्रियानी (चारित्रनी) शुद्धता छे. (अहीं
परिणतिनी स्थिरतारूप क्रिया समजवी). जो विशुद्धतामां शुद्धता छे तो (क्रमशः) यथाख्यात
चारित्ररूप थाय छे, जो विशुद्धतामां शुद्धतानो अंश न होत तो केवळीमां ज्ञानगुण शुद्ध होत
अने क्रिया (परिणति) अशुद्ध रहेत, पण एम तो नथी. (तेथी सिद्ध थाय छे के) तेमां
(विशुद्धतामां) शुद्धता हती तेनाथी विशुद्धता थई छे.
अहीं कोई कहे के ज्ञाननी शुद्धता वडे क्रिया शुद्ध थई; पण एम नथी. कोई गुण
अन्य गुणना आधारथी नथी, सर्व असहायरूप छे.
वळी सांभळ! जो क्रियापद्धति सर्वथा अशुद्ध होत तो अशुद्धतानी एटली शक्ति नथी
के ते मोक्षमार्ग तरफ गति करे. माटे विशुद्धतामां यथाख्यात चारित्रनो अंश छे तेथी ते अंश
क्रमशः पूर्ण थयो.
हे भाई! तें विशुद्धतामां शुद्धता मानी के नहि? जो तें तेने मानी तो कांई अन्य
कहेवानुं कार्य नथी, जो तें नथी मानी तो तारुं द्रव्य ए प्रकारे परिणम्युं छे त्यां अमे शुं
करीए? जो माने तो शाबाश!
ए द्रव्यार्थिकनी चौभंगी पूर्ण थई.