Page 332 of 380
PDF/HTML Page 361 of 409
single page version
लोकालोकौ स्वपरमखिलं चेतनाचेतनं च
तेनैवायं विदितमहिमा तीर्थनाथो जिनेन्द्रः
Page 333 of 380
PDF/HTML Page 362 of 409
single page version
प्रामाण्यादभ्युपगम्याः अर्थपर्यायाः षण्णां द्रव्याणां साधारणाः, नरनारकादिव्यंजनपर्याया
जीवानां पंचसंसारप्रपंचानां, पुद्गलानां स्थूलस्थूलादिस्कन्धपर्यायाः, चतुर्णां धर्मादीनां
शुद्धपर्यायाश्चेति, एभिः संयुक्तं तद्द्रव्यजालं यः खलु न पश्यति, तस्य संसारिणामिव
परोक्ष
कालत्रयं च तरसा सकलज्ञमानी
हानिवृद्धिरूप, सूक्ष्म, परमागमना प्रमाणथी स्वीकारवायोग्य अर्थपर्यायो छ द्रव्योने साधारण
छे, नरनारकादि व्यंजनपर्यायो पांच प्रकारना
गुणपर्यायोथी संयुक्त एवा ते द्रव्यसमूहने जे खरेखर देखतो नथी;
Page 334 of 380
PDF/HTML Page 363 of 409
single page version
मानात
कामिनीना जेओ जीवितेश छे (
(निर्विकार) शुद्ध आत्मस्वरूपने नथी ज जाणता’
Page 335 of 380
PDF/HTML Page 364 of 409
single page version
चरमचरं च जगत्प्रतिक्षणम्
वचनमिदं वदतांवरस्य ते
स्वात्मानमेकमनघं निजसौख्यनिष्ठम्
वक्तीति कोऽपि मुनिपो न च तस्य दोषः
वचन (तारी) सर्वज्ञतानुं चिह्न छे.’’
Page 336 of 380
PDF/HTML Page 365 of 409
single page version
कश्चिदात्मा भव्यजीव इति अयं खलु स्वभाववादः
२. कौतूहल = इन्तेजारी; उत्सुकता; आश्चर्य; कौतुक.
Page 337 of 380
PDF/HTML Page 366 of 409
single page version
(
आत्माने ज्ञान न जाणे तो ते ज्ञान, देवदत्त विनानी कुहाडीनी माफक,
ज छे.)
Page 338 of 380
PDF/HTML Page 367 of 409
single page version
स्वात्मात्मानं नियतमधुना तेन जानाति चैकम्
भावना भाववी.’’
ते ज्ञान प्रगट थयेली सहज अवस्था वडे सीधुं (प्रत्यक्षपणे) आत्माने न जाणे तो ते ज्ञान
अविचळ आत्मस्वरूपथी अवश्य भिन्न ठरे! २८६.
Page 339 of 380
PDF/HTML Page 368 of 409
single page version
Page 340 of 380
PDF/HTML Page 369 of 409
single page version
होवा छतां अने देखता होवा छतां, ते परम भट्टारक केवळीने मनप्रवृत्तिनो (मननी
प्रवृत्तिनो, भावमनपरिणतिनो) अभाव होवाथी इच्छापूर्वक वर्तन होतुं नथी; तेथी ते
भगवान ‘केवळज्ञानी’ तरीके प्रसिद्ध छे; वळी ते कारणथी ते भगवान अबंधक छे.
अबंधक कह्यो छे.’’
Page 341 of 380
PDF/HTML Page 370 of 409
single page version
पश्यन् तद्वत
ज्ञानज्योतिर्हतमलकलिः सर्वलोकैकसाक्षी
परने (
(
Page 342 of 380
PDF/HTML Page 371 of 409
single page version
न भवति; ईहापूर्वं वचनमेव साभिलाषात्मकजीवस्य बंधकारणं भवति, केवलि-
मुखारविन्दविनिर्गतो दिव्यध्वनिरनीहात्मकः समस्तजनहृदयाह्लादकारणम्; ततः सम्यग्ज्ञानिनो
बंधाभाव इति
नथी; (वळी) इच्छापूर्वक वचन ज
दिव्यध्वनि तो अनिच्छात्मक (इच्छारहित) होय छे; माटे सम्यग्ज्ञानीने (केवळज्ञानीने)
बंधनो अभाव छे.
Page 343 of 380
PDF/HTML Page 372 of 409
single page version
तस्मादेषः प्रकटमहिमा विश्वलोकैकभर्ता
सद्बोधस्थं भुवनमखिलं तद्गतं वस्तुजालम्
तस्मिन् काचिन्न भवति पुनर्मूर्च्छना चेतना च
रागाभावादतुलमहिमा राजते वीतरागः
ज्ञानज्योतिश्छुरितभुवनाभोगभागः समन्तात
द्रव्यभावस्वरूप एवो आ बंध कई रीते थाय? (कारण के) मोहना अभावने लीधे तेमने
खरेखर समस्त रागद्वेषादि समूह तो छे नहि. २८९.
एक ज देव छे. ते निकट (साक्षात
२. चेतना = भानवाळी दशा; शुद्धि; ज्ञानदशा.
Page 344 of 380
PDF/HTML Page 373 of 409
single page version
रागना अभावने लीधे अतुल-महिमावंत एवा ते (भगवान) वीतरागपणे विराजे छे. ते
श्रीमान (शोभावंत भगवान) निजसुखमां लीन छे, मुक्तिरूपी स्त्रीना नाथ छे अने
ज्ञानज्योति वडे तेमणे लोकना विस्तारने सर्वतः छाई दीधो छे. २९१.
मनप्रवृत्तिनो अभाव छे; अथवा, तेओ इच्छापूर्वक ऊभा रहेता नथी, बेसता नथी के
श्रीविहारादिक करता नथी, कारण के
Page 345 of 380
PDF/HTML Page 374 of 409
single page version
सह यः वर्तत इति साक्षार्थं मोहनीयस्य वशगतानां साक्षार्थप्रयोजनानां संसारिणामेव
बंध इति
मुक्ति श्रीललनामुखाम्बुजरवेः सद्धर्मरक्षामणेः
(इन्द्रियविषय); अक्षार्थ सहित होय ते ‘साक्षार्थ’; मोहनीयने वश थयेला, साक्षार्थप्रयोजन
(
Page 346 of 380
PDF/HTML Page 375 of 409
single page version
आयुःकर्मक्षये जाते वेदनीयनामगोत्राभिधानशेषप्रकृतीनां निर्नाशो भवति
(केवळज्ञानी पुराणपुरुष) खरेखर अगम्य महिमावंत छे अने पापरूपी वनने बाळनार
अग्नि समान छे. २९२.
मणि. (केवळीभगवान सद्धर्मना रक्षण माटे
आवे छे.
Page 347 of 380
PDF/HTML Page 376 of 409
single page version
प्रत्यक्षोऽद्य स्तवनविषयो नैव सिद्धः प्रसिद्धः
स्वात्मन्युच्चैरविचलतया निश्चयेनैवमास्ते
महिमावाळा निज स्वरूपमां लीन होवा छतां व्यवहारे ते भगवान अर्ध क्षणमां
(समयमात्रमां) लोकाग्रे पहोंचे छे.
[श्लोकार्थ
एम प्रसिद्ध छे. ते देवाधिदेव व्यवहारथी लोकना अग्रे सुस्थित छे अने निश्चयथी निज
आत्मामां एम ने एम अत्यंत अविचळपणे रहे छे. २९४.
Page 348 of 380
PDF/HTML Page 377 of 409
single page version
सिद्धोने (अर्थात
परम छे; त्रणे काळे निरुपाधि-स्वरूपवाळुं होवाने लीधे आठ कर्म विनानुं छे; द्रव्यकर्म अने
भावकर्म रहित होवाने लीधे शुद्ध छे; सहजज्ञान, सहजदर्शन, सहजचारित्र अने
सहजचित्शक्तिमय होवाने लीधे ज्ञानादिक चार स्वभाववाळुं छे; सादि-सांत, मूर्त
इन्द्रियात्मक विजातीय-विभावव्यंजनपर्याय रहित होवाने लीधे अक्षय छे; प्रशस्त-अप्रशस्त
Page 349 of 380
PDF/HTML Page 378 of 409
single page version
कर्मद्वन्द्वाभावादविनाशम्, वधबंधच्छेदयोग्यमूर्तिमुक्त त्वादच्छेद्यमिति
निखिलदुरितदुर्गव्रातदावाग्निरूपम्
सकलविमलबोधस्ते भवत्येव तस्मात
छेदने योग्य मूर्तिथी (मूर्तिकताथी) रहित होवाने लीधे अच्छेद्य छे.
Page 350 of 380
PDF/HTML Page 379 of 409
single page version
पुरंध्रिकासंभोगसंभवसुखदुःखाभावात्पुण्यपापनिर्मुक्त म्, पुनरागमनहेतुभूतप्रशस्ताप्रशस्तमोह-
रागद्वेषाभावात्पुनरागमनविरहितम्, नित्यमरणतद्भवमरणकारणकलेवरसंबन्धाभावान्नित्यम्,
निजगुणपर्यायप्रच्यवनाभावादचलम्, परद्रव्यावलम्बनाभावादनालम्बमिति
(निर्विघ्न) छे; सर्व आत्मप्रदेशे भरेला चिदानंदमयपणाने लीधे अतींद्रिय छे; त्रण
तत्त्वोमां विशिष्ट होवाने लीधे (बहिरात्मतत्त्व, अंतरात्मतत्त्व अने परमात्मतत्त्व ए
त्रणेमां विशिष्ट
पर्यायोथी च्युत नहि थतुं होवाने लीधे अचळ छे; परद्रव्यना अवलंबननो अभाव
होवाने लीधे निरालंब छे.
२. पुनरागमन = (चार गतिमांनी कोई गतिमां) पाछा आववुं ते; फरीने जन्मवुं ते.
३. नित्य मरण = समये समये थतो आयुकर्मना निषेकोनो क्षय
Page 351 of 380
PDF/HTML Page 380 of 409
single page version
सुप्ता यस्मिन्नपदमपदं तद्विबुध्यध्वमंधाः
शुद्धः शुद्धः स्वरसभरतः स्थायिभावत्वमेति
स्थायी संसृतिनाशकारणमयं सम्यग्
एको भाति कलौ युगे मुनिपतिः पापाटवीपावकः
जे पदमां सूता छे
आवो
थता पोताना भावोथी रहित होवाने लीधे भावे शुद्ध छे.)’’
बुद्धिमान पुरुष समस्त रागद्वेषना समूहने छोडीने तेम ज ते परम पंचम भावने जाणीने,
एकलो, कळियुगमां पापवनना अग्निरूप मुनिवर तरीके शोभे छे (अर्थात
बाळवामां अग्नि समान मुनिवर छे). २९७.