Niyamsar-Gujarati (Devanagari transliteration). Shlok: 283-297 ; Gatha: 168-178.

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३३२
]
नियमसार
[ भगवानश्रीकुंदकुंद-
‘‘जं पेच्छदो अमुत्तं मुत्तेसु अदिंदियं च पच्छण्णं
सयलं सगं च इदरं तं णाणं हवदि पच्चक्खं ।।’’
तथा हि
(मंदाक्रांता)
सम्यग्वर्ती त्रिभुवनगुरुः शाश्वतानन्तधामा
लोकालोकौ स्वपरमखिलं चेतनाचेतनं च
तार्तीयं यन्नयनमपरं केवलज्ञानसंज्ञं
तेनैवायं विदितमहिमा तीर्थनाथो जिनेन्द्रः
।।२८३।।
पुव्वुत्तसयलदव्वं णाणागुणपज्जएण संजुत्तं
जो ण य पेच्छइ सम्मं परोक्खदिट्ठी हवे तस्स ।।१६८।।
पूर्वोक्त सकलद्रव्यं नानागुणपर्यायेण संयुक्त म्
यो न च पश्यति सम्यक् परोक्षद्रष्टिर्भवेत्तस्य ।।१६८।।
‘‘[गाथार्थः] देखनारनुं जे ज्ञान अमूर्तने, मूर्त पदार्थोमां पण अतींद्रियने, अने
प्रच्छन्नने ए बधांयनेस्वने तेम ज परनेदेखे छे, ते ज्ञान प्रत्यक्ष छे.’’
वळी (आ १६७ मी गाथानी टीका पूर्ण करतां टीकाकार मुनिराज श्लोक कहे छे)ः
[श्लोकार्थ] केवळज्ञान नामनुं जे त्रीजुं उत्कृष्ट नेत्र तेनाथी ज जेमनो प्रसिद्ध
महिमा छे, जेओ त्रण लोकना गुरु छे अने शाश्वत अनंत जेमनुं *धाम छेएवा आ
तीर्थनाथ जिनेंद्र लोकालोकने अर्थात् स्व-पर एवां समस्त चेतन-अचेतन पदार्थोने सम्यक्
प्रकारे (बराबर) जाणे छे. २८३.
विधविध गुणो ने पर्ययो संयुक्त द्रव्य समस्तने
देखे न जे सम्यक् प्रकार, परोक्ष द्रष्टि तेहने. १६८.
अन्वयार्थ[नानागुणपर्यायेण संयुक्त म्] विधविध गुणो अने पर्यायोथी संयुक्त
[पूर्वोक्त सकलद्रव्यं] पूर्वोक्त समस्त द्रव्योने [यः] जे [सम्यक्] सम्यक् प्रकारे (बराबर)
[न च पश्यति] देखतो नथी, [तस्य] तेने [परोक्षद्रष्टिः भवेत्] परोक्ष दर्शन छे.
*धाम = (१) भव्यता; (२) तेज; (३) बळ.

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कहानजैनशास्त्रमाळा ]
शुद्धोपयोग अधिकार
[ ३३३
अत्र केवलद्रष्टेरभावात् सकलज्ञत्वं न समस्तीत्युक्त म्
पूर्वसूत्रोपात्तमूर्तादिद्रव्यं समस्तगुणपर्यायात्मकं, मूर्तस्य मूर्तगुणाः, अचेतनस्या-
चेतनगुणाः, अमूर्तस्यामूर्तगुणाः, चेतनस्य चेतनगुणाः, षड्ढानिवृद्धिरूपाः सूक्ष्माः परमागम-
प्रामाण्यादभ्युपगम्याः अर्थपर्यायाः षण्णां द्रव्याणां साधारणाः, नरनारकादिव्यंजनपर्याया
जीवानां पंचसंसारप्रपंचानां, पुद्गलानां स्थूलस्थूलादिस्कन्धपर्यायाः, चतुर्णां धर्मादीनां
शुद्धपर्यायाश्चेति, एभिः संयुक्तं तद्द्रव्यजालं यः खलु न पश्यति, तस्य संसारिणामिव
परोक्ष
द्रष्टिरिति
(वसंततिलका)
यो नैव पश्यति जगत्त्रयमेकदैव
कालत्रयं च तरसा सकलज्ञमानी
प्रत्यक्षद्रष्टिरतुला न हि तस्य नित्यं
सर्वज्ञता कथमिहास्य जडात्मनः स्यात।।२८४।।
टीकाअहीं, केवळदर्शनना अभावे (अर्थात् प्रत्यक्ष दर्शनना अभावमां) सर्वज्ञपणुं
होतुं नथी एम कह्युं छे.
समस्त गुणो अने पर्यायोथी संयुक्त पूर्वसूत्रोक्त (१६७ मी गाथामां कहेलां) मूर्तादि
द्रव्योने जे देखतो नथी;अर्थात् मूर्त द्रव्यना मूर्त गुणो होय छे, अचेतनना अचेतन गुणो
होय छे, अमूर्तना अमूर्त गुणो होय छे, चेतनना चेतन गुणो होय छे; षट् (छ प्रकारनी)
हानिवृद्धिरूप, सूक्ष्म, परमागमना प्रमाणथी स्वीकारवायोग्य अर्थपर्यायो छ द्रव्योने साधारण
छे, नरनारकादि व्यंजनपर्यायो पांच प्रकारना
*संसारप्रपंचवाळा जीवोने होय छे, पुद्गलोने
स्थूल-स्थूल वगेरे स्कंधपर्यायो होय छे अने धर्मादि चार द्रव्योने शुद्ध पर्यायो होय छे; आ
गुणपर्यायोथी संयुक्त एवा ते द्रव्यसमूहने जे खरेखर देखतो नथी;
तेने (भले ते
सर्वज्ञपणाना अभिमानथी दग्ध होय तोपण) संसारीओनी माफक परोक्ष द्रष्टि छे.
[हवे आ १६८मी गाथानी टीका पूर्ण करतां टीकाकार मुनिराज श्लोक कहे छेः]
*संसारप्रपंच = संसारविस्तार. (संसारविस्तार द्रव्य, क्षेत्र, काळ, भव अने भावएवा पांच
परावर्तनरूप छे.)

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३३
४ ]
नियमसार
[ भगवानश्रीकुंदकुंद-
लोयालोयं जाणइ अप्पाणं णेव केवली भगवं
जइ कोइ भणइ एवं तस्स य किं दूसणं होइ ।।१६9।।
लोकालोकौ जानात्यात्मानं नैव केवली भगवान्
यदि कोऽपि भणति एवं तस्य च किं दूषणं भवति ।।१६9।।
व्यवहारनयप्रादुर्भावकथनमिदम्
सकलविमलकेवलज्ञानत्रितयलोचनो भगवान् अपुनर्भवकमनीयकामिनीजीवितेशः
षड्द्रव्यसंकीर्णलोकत्रयं शुद्धाकाशमात्रालोकं च जानाति, पराश्रितो व्यवहार इति
मानात
् व्यवहारेण व्यवहारप्रधानत्वात्, निरुपरागशुद्धात्मस्वरूपं नैव जानाति, यदि
व्यवहारनयविवक्षया कोपि जिननाथतत्त्वविचारलब्धः (दक्षः) कदाचिदेवं वक्ति चेत्, तस्य
[श्लोकार्थ] सर्वज्ञताना अभिमानवाळो जे जीव शीघ्र एक ज काळे त्रण
जगतने अने त्रण काळने देखतो नथी, तेने सदा (अर्थात् कदापि) अतुल प्रत्यक्ष दर्शन
नथी; ते जड आत्माने सर्वज्ञता कई रीते होय? २८४.
प्रभु केवळी जाणे त्रिलोक-अलोकने, नहि आत्मने,
जो कोई भाखे एम तो तेमां कहो शो दोष छे? १६९.
अन्वयार्थ[केवली भगवान्] (व्यवहारथी) केवळी भगवान [लोकालोकौ]
लोकालोकने [जानाति] जाणे छे, [न एव आत्मानम्] आत्माने नहि[एवं] एम [यदि]
जो [कः अपि भणति] कोई कहे तो [तस्य च किं दूषणं भवति] तेने शो दोष छे?
(अर्थात् कांई दोष नथी.)
टीकाआ, व्यवहारनयनी प्रगटताथी कथन छे.
‘पराश्रितो व्यवहारः (व्यवहारनय पराश्रित छे)’ एवा (शास्त्रना) अभिप्रायने
लीधे, व्यवहारे व्यवहारनयनी प्रधानता द्वारा (अर्थात् व्यवहारे व्यवहारनयने प्रधान
करीने), ‘सकळ-विमळ केवळज्ञान जेमनुं त्रीजुं लोचन छे अने अपुनर्भवरूपी सुंदर
कामिनीना जेओ जीवितेश छे (
मुक्तिसुंदरीना जेओ प्राणनाथ छे) एवा भगवान छ
द्रव्योथी व्याप्त त्रण लोकने अने शुद्ध-आकाशमात्र अलोकने जाणे छे, निरुपराग
(निर्विकार) शुद्ध आत्मस्वरूपने नथी ज जाणता’
एम जो व्यवहारनयनी विवक्षाथी

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कहानजैनशास्त्रमाळा ]
शुद्धोपयोग अधिकार
[ ३३५
न खलु दूषणमिति
तथा चोक्तं श्रीसमन्तभद्रस्वामिभिः
(अपरवक्त्र)
‘‘स्थितिजनननिरोधलक्षणं
चरमचरं च जगत्प्रतिक्षणम्
इति जिन सकलज्ञलांछनं
वचनमिदं वदतांवरस्य ते
।।’’
तथा हि
(वसंततिलका)
जानाति लोकमखिलं खलु तीर्थनाथः
स्वात्मानमेकमनघं निजसौख्यनिष्ठम्
नो वेत्ति सोऽयमिति तं व्यवहारमार्गाद्
वक्तीति कोऽपि मुनिपो न च तस्य दोषः
।।२८५।।
कोई जिननाथना तत्त्वविचारमां निपुण जीव (जिनदेवे कहेला तत्त्वना विचारमां प्रवीण
जीव) कदाचित् कहे, तो तेने खरेखर दूषण नथी.
एवी रीते (आचार्यवर) श्री समंतभद्रस्वामीए (बृहत्स्वयंभूस्तोत्रमां श्री मुनिसुव्रत
भगवाननी स्तुति करतां ११४ मा श्लोक द्वारा) कह्युं छे केः
‘‘[श्लोकार्थ] हे जिनेंद्र! तुं वक्ताओमां श्रेष्ठ छे; ‘चराचर (जंगम तथा
स्थावर) जगत प्रतिक्षण (प्रत्येक समये) उत्पादव्ययध्रौव्यलक्षणवाळुं छे’ एवुं आ तारुं
वचन (तारी) सर्वज्ञतानुं चिह्न छे.’’
वळी (आ १६९ मी गाथानी टीका पूर्ण करतां टीकाकार मुनिराज श्लोक कहे
छे)ः
[श्लोकार्थ] तीर्थनाथ खरेखर आखा लोकने जाणे छे अने तेओ एक, अनघ
(निर्दोष), निजसौख्यनिष्ठ (निज सुखमां लीन) स्वात्माने जाणता नथीएम कोई
मुनिवर व्यवहारमार्गथी कहे तो तेने दोष नथी. २८५.

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३३
६ ]
नियमसार
[ भगवानश्रीकुंदकुंद-
णाणं जीवसरूवं तम्हा जाणेइ अप्पगं अप्पा
अप्पाणं ण वि जाणदि अप्पादो होदि विदिरित्तं ।।१७०।।
ज्ञानं जीवस्वरूपं तस्माज्जानात्यात्मकं आत्मा
आत्मानं नापि जानात्यात्मनो भवति व्यतिरिक्त म् ।।१७०।।
अत्र ज्ञानस्वरूपो जीव इति वितर्केणोक्त :
इह हि ज्ञानं तावज्जीवस्वरूपं भवति, ततो हेतोरखंडाद्वैतस्वभावनिरतं
निरतिशयपरमभावनासनाथं मुक्ति सुंदरीनाथं बहिर्व्यावृत्तकौतूहलं निजपरमात्मानं जानाति
कश्चिदात्मा भव्यजीव इति अयं खलु स्वभाववादः
अस्य विपरीतो वितर्कः स खलु
विभाववादः प्राथमिकशिष्याभिप्रायः कथमिति चेत्, पूर्वोक्त स्वरूपमात्मानं खलु न
जानात्यात्मा, स्वरूपावस्थितः संतिष्ठति यथोष्णस्वरूपस्याग्नेः स्वरूपमग्निः किं जानाति,
छे ज्ञान जीवस्वरूप, तेथी जीव जाणे जीवने;
जीवने न जाणे ज्ञान तो ए जीवथी जुदुं ठरे! १७०.
अन्वयार्थ[ज्ञानं] ज्ञान [जीवस्वरूपं] जीवनुं स्वरूप छे, [तस्मात्] तेथी [आत्मा]
आत्मा [आत्मकं] आत्माने [जानाति] जाणे छे; [आत्मानं न अपि जानाति] जो ज्ञान आत्माने
न जाणे तो [आत्मनः] आत्माथी [व्यतिरिक्त म्] व्यतिरिक्त (जुदुं) [भवति] ठरे!
टीकाअहीं (आ गाथामां) ‘जीव ज्ञानस्वरूप छे’ एम वितर्कथी (दलीलथी) कह्युं
छे.
प्रथम तो, ज्ञान खरेखर जीवनुं स्वरूप छे; ते हेतुथी, जे अखंड अद्वैत स्वभावमां
लीन छे, जे निरतिशय परम भावना सहित छे, जे मुक्तिसुंदरीनो नाथ छे अने बहारमां
जेणे कौतूहल व्यावृत्त कर्युं छे (अर्थात् बाह्य पदार्थो संबंधी कुतूहलनो जेणे अभाव कर्यो
छे) एवा निज परमात्माने कोई आत्माभव्य जीवजाणे छे.आम आ खरेखर
स्वभाववाद छे. आनाथी विपरीत वितर्क (विचार) ते खरेखर विभाववाद छे, प्राथमिक
शिष्यनो अभिप्राय छे.
१. निरतिशय = जेनाथी बीजुं कोई चडियातुं नथी एवी; अनुत्तम; श्रेष्ठ; अजोड.
२. कौतूहल = इन्तेजारी; उत्सुकता; आश्चर्य; कौतुक.

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कहानजैनशास्त्रमाळा ]
शुद्धोपयोग अधिकार
[ ३३७
तथैव ज्ञानज्ञेयविकल्पाभावात् सोऽयमात्मात्मनि तिष्ठति हंहो प्राथमिकशिष्य
अग्निवदयमात्मा किमचेतनः किं बहुना तमात्मानं ज्ञानं न जानाति चेद् देवदत्त-
रहितपरशुवत् इदं हि नार्थक्रियाकारि, अत एव आत्मनः सकाशाद् व्यतिरिक्तं भवति तन्न
खलु सम्मतं स्वभाववादिनामिति
तथा चोक्तं श्रीगुणभद्रस्वामिभिः
(अनुष्टुभ्)
‘‘ज्ञानस्वभावः स्यादात्मा स्वभावावाप्तिरच्युतिः
तस्मादच्युतिमाकांक्षन् भावयेज्ज्ञानभावनाम् ।।’’
ते (विपरीत वितर्कप्राथमिक शिष्यनो अभिप्राय) कया प्रकारे छे? (ते आ
प्रकारे छेः) ‘पूर्वोक्तस्वरूप (ज्ञानस्वरूप) आत्माने आत्मा खरेखर जाणतो नथी,
स्वरूपमां अवस्थित रहे छे (आत्मामां मात्र स्थित रहे छे). जेवी रीते उष्णतास्वरूप
अग्निना स्वरूपने (अर्थात् अग्निने) शुं अग्नि जाणे छे? (नथी ज जाणतो.) तेवी ज
रीते ज्ञानज्ञेय संबंधी विकल्पना अभावथी आ आत्मा आत्मामां (मात्र) स्थित रहे छे
(
आत्माने जाणतो नथी).’
(उपरोक्त वितर्कनो उत्तरः) ‘हे प्राथमिक शिष्य! अग्निनी माफक शुं आ
आत्मा अचेतन छे (के जेथी ते पोताने न जाणे)? वधारे शुं कहेवुं? (संक्षेपमां,) जो ते
आत्माने ज्ञान न जाणे तो ते ज्ञान, देवदत्त विनानी कुहाडीनी माफक,
*अर्थक्रियाकारी न
ठरे, अने तेथी ते आत्माथी भिन्न ठरे! ते तो (अर्थात् ज्ञान ने आत्मानी सर्वथा भिन्नता
तो) खरेखर स्वभाववादीओने संमत नथी. (माटे नक्की कर के ज्ञान आत्माने जाणे छे.)’
एवी रीते (आचार्यवर) श्री गुणभद्रस्वामीए (आत्मानुशासनमां १७४मा श्लोक
द्वारा) कह्युं छे केः
‘‘[श्लोकार्थ] आत्मा ज्ञानस्वभाव छे; स्वभावनी प्राप्ति ते अच्युति (अविनाशी
*अर्थक्रियाकारी = प्रयोजनभूत क्रिया करनारुं. (जेम देवदत्त वगरनी एकली कुहाडी अर्थक्रिया
कापवानी क्रियाकरती नथी, तेम जो ज्ञान आत्माने जाणतुं न होय तो ज्ञाने पण अर्थक्रिया
जाणवानी क्रियान करी; तेथी जेम अर्थक्रियाशून्य कुहाडी देवदत्तथी भिन्न छे तेम अर्थक्रियाशून्य
ज्ञान आत्माथी भिन्न होवुं जोईए! परंतु ते तो स्पष्टपणे विरुद्ध छे. माटे ज्ञान आत्माने जाणे
ज छे.)

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३३
८ ]
नियमसार
[ भगवानश्रीकुंदकुंद-
तथा हि
(मंदाक्रांता)
ज्ञानं तावद्भवति सुतरां शुद्धजीवस्वरूपं
स्वात्मात्मानं नियतमधुना तेन जानाति चैकम्
तच्च ज्ञानं स्फु टितसहजावस्थयात्मानमारात
नो जानाति स्फु टमविचलाद्भिन्नमात्मस्वरूपात।।२८६।।
तथा चोक्त म्
‘‘णाणं अव्विदिरित्तं जीवादो तेण अप्पगं मुणइ
जदि अप्पगं ण जाणइ भिण्णं तं होदि जीवादो ।।’’
अप्पाणं विणु णाणं णाणं विणु अप्पगो ण संदेहो
तम्हा सपरपयासं णाणं तह दंसणं होदि ।।१७१।।
आत्मानं विद्धि ज्ञानं ज्ञानं विद्धयात्मको न संदेहः
तस्मात्स्वपरप्रकाशं ज्ञानं तथा दर्शनं भवति ।।१७१।।
दशा) छे; माटे अच्युतिने (अविनाशीपणाने, शाश्वत अवस्थाने) इच्छनार जीवे ज्ञाननी
भावना भाववी.’’
वळी (आ १७० मी गाथानी टीकाना कळशरूपे टीकाकार मुनिराज श्लोक कहे छे)ः
[श्लोकार्थ] ज्ञान तो बराबर शुद्धजीवनुं स्वरूप छे; तेथी (अमारो) निज आत्मा
हमणां (साधक दशामां) एक (पोताना) आत्माने नियमथी (निश्चयथी) जाणे छे. अने, जो
ते ज्ञान प्रगट थयेली सहज अवस्था वडे सीधुं (प्रत्यक्षपणे) आत्माने न जाणे तो ते ज्ञान
अविचळ आत्मस्वरूपथी अवश्य भिन्न ठरे! २८६.
वळी एवी रीते (अन्यत्र गाथा द्वारा) कह्युं छे केः
‘‘[गाथार्थः] ज्ञान जीवथी अभिन्न छे तेथी ते आत्माने जाणे छे; जो ज्ञान
आत्माने न जाणे तो ते जीवथी भिन्न ठरे!’’
रे! जीव छे ते ज्ञान छे, ने ज्ञान छे ते जीव छे;
ते कारणे निजपरप्रकाशक ज्ञान तेम ज द्रष्टि छे. १७१.
अन्वयार्थ[आत्मानं ज्ञानं विद्धि] आत्माने ज्ञान जाण, अने [ज्ञानम् आत्मकः

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कहानजैनशास्त्रमाळा ]
शुद्धोपयोग अधिकार
[ ३३९
गुणगुणिनोः भेदाभावस्वरूपाख्यानमेतत
सकलपरद्रव्यपराङ्मुखमात्मानं स्वस्वरूपपरिच्छित्तिसमर्थसहजज्ञानस्वरूपमिति हे शिष्य
त्वं विद्धि जानीहि तथा विज्ञानमात्मेति जानीहि तत्त्वं स्वपरप्रकाशं ज्ञानदर्शनद्वितयमित्यत्र
संदेहो नास्ति
(अनुष्टुभ्)
आत्मानं ज्ञानद्रग्रूपं विद्धि द्रग्ज्ञानमात्मकं
स्वं परं चेति यत्तत्त्वमात्मा द्योतयति स्फु टम् ।।२८७।।
जाणंतो पस्संतो ईहापुव्वं ण होइ केवलिणो
केवलिणाणी तम्हा तेण दु सोऽबंधगो भणिदो ।।१७२।।
जानन् पश्यन्नीहापूर्वं न भवति केवलिनः
केवलज्ञानी तस्मात् तेन तु सोऽबन्धको भणितः ।।१७२।।
विद्धि] ज्ञान आत्मा छे एम जाण;[न संदेहः] आमां संदेह नथी. [तस्मात्] तेथी
[ज्ञानं] ज्ञान [तथा] तेम ज [दर्शनं] दर्शन [स्वपरप्रकाशं] स्वपरप्रकाशक [भवति] छे.
टीकाआ, गुण-गुणीमां भेदनो अभाव होवारूप स्वरूपनुं कथन छे.
हे शिष्य! सर्व परद्रव्यथी पराङ्मुख आत्माने तुं निज स्वरूपने जाणवामां समर्थ
सहजज्ञानस्वरूप जाण, तथा ज्ञान आत्मा छे एम जाण. माटे तत्त्व (स्वरूप) एम
छे के ज्ञान तथा दर्शन बन्ने स्वपरप्रकाशक छे. आमां संदेह नथी.
[हवे आ १७१ मी गाथानी टीका पूर्ण करतां टीकाकार मुनिराज श्लोक कहे
छेः]
[श्लोकार्थ] आत्माने ज्ञानदर्शनरूप जाण अने ज्ञानदर्शनने आत्मा जाण; स्व
अने पर एवा तत्त्वने (समस्त पदार्थोने) आत्मा स्पष्टपणे प्रकाशे छे. २८७.
जाणे अने देखे छतां इच्छा न केवळीजिनने;
ने तेथी ‘केवळज्ञानी’ तेम ‘अबंध’ भाख्या तेमने. १७२.
अन्वयार्थ[जानन् पश्यन्] जाणता अने देखता होवा छतां, [केवलिनः]

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३४
० ]
नियमसार
[ भगवानश्रीकुंदकुंद-
सर्वज्ञवीतरागस्य वांछाभावत्वमत्रोक्त म्
भगवानर्हत्परमेष्ठी साद्यनिधनामूर्तातीन्द्रियस्वभावशुद्धसद्भूतव्यवहारेण केवलज्ञानादि-
शुद्धगुणानामाधारभूतत्वात् विश्वमश्रान्तं जानन्नपि पश्यन्नपि वा मनःप्रवृत्तेरभावादीहापूर्वकं
वर्तनं न भवति तस्य केवलिनः परमभट्टारकस्य, तस्मात् स भगवान् केवलज्ञानीति प्रसिद्धः,
पुनस्तेन कारणेन स भगवान् अबन्धक इति
तथा चोक्तं श्रीप्रवचनसारे
‘‘ण वि परिणमदि ण गेण्हदि उप्पज्जदि णेव तेसु अट्ठेसु
जाणण्णवि ते आदा अबंधगो तेण पण्णत्तो ।।’’
तथा हि
केवळीने [ईहापूर्वं] इच्छापूर्वक (वर्तन) [न भवति] होतुं नथी; [तस्मात्] तेथी तेमने
[केवलज्ञानी] ‘केवळज्ञानी’ कह्या छे; [तेन तु] वळी तेथी [सः अबन्धकः भणितः] अबंधक
कह्या छे.
टीकाअहीं, सर्वज्ञ वीतरागने वांछानो अभाव होय छे एम कह्युं छे.
भगवान अर्हंत परमेष्ठी सादि-अनंत अमूर्त अतींद्रियस्वभाववाळा शुद्धसद्भूत-
व्यवहारथी केवळज्ञानादि शुद्ध गुणोना आधारभूत होवाने लीधे विश्वने निरंतर जाणता
होवा छतां अने देखता होवा छतां, ते परम भट्टारक केवळीने मनप्रवृत्तिनो (मननी
प्रवृत्तिनो, भावमनपरिणतिनो) अभाव होवाथी इच्छापूर्वक वर्तन होतुं नथी; तेथी ते
भगवान ‘केवळज्ञानी’ तरीके प्रसिद्ध छे; वळी ते कारणथी ते भगवान अबंधक छे.
एवी रीते (श्रीमद्भगवत्कुंदकुंदाचार्यदेवप्रणीत) श्री प्रवचनसारमां (५२मी गाथा
द्वारा) कह्युं छे केः
‘‘[गाथार्थः] (केवळज्ञानी) आत्मा पदार्थोने जाणतो होवा छतां ते-रूपे
परिणमतो नथी, तेमने ग्रहतो नथी अने ते पदार्थोरूपे उत्पन्न थतो नथी तेथी तेने
अबंधक कह्यो छे.’’
वळी (आ १७२मी गाथानी टीका पूर्ण करतां टीकाकार मुनिराज श्लोक कहे
छे)ः

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कहानजैनशास्त्रमाळा ]
शुद्धोपयोग अधिकार
[ ३४१
(मंदाक्रांता)
जानन् सर्वं भुवनभवनाभ्यन्तरस्थं पदार्थं
पश्यन् तद्वत
् सहजमहिमा देवदेवो जिनेशः
मोहाभावादपरमखिलं नैव गृह्णाति नित्यं
ज्ञानज्योतिर्हतमलकलिः सर्वलोकैकसाक्षी
।।२८८।।
परिणामपुव्ववयणं जीवस्स य बंधकारणं होइ
परिणामरहियवयणं तम्हा णाणिस्स ण हि बंधो ।।१७३।।
ईहापुव्वं वयणं जीवस्स य बंधकारणं होइ
ईहारहियं वयणं तम्हा णाणिस्स ण हि बंधो ।।१७४।।
परिणामपूर्ववचनं जीवस्य च बंधकारणं भवति
परिणामरहितवचनं तस्माज्ज्ञानिनो न हि बंधः ।।१७३।।
ईहापूर्वं वचनं जीवस्य च बंधकारणं भवति
ईहारहितं वचनं तस्माज्ज्ञानिनो न हि बंधः ।।१७४।।
[श्लोकार्थ] सहजमहिमावंत देवाधिदेव जिनेश लोकरूपी भवननी अंदर रहेला
सर्व पदार्थोने जाणता होवा छतां, तेम ज देखता होवा छतां, मोहना अभावने लीधे समस्त
परने (
कोई पण पर पदार्थने) नित्य (कदापि) ग्रहता नथी ज; (परंतु) जेमणे
ज्ञानज्योति वडे मळरूप क्लेशनो नाश कर्यो छे एवा ते जिनेश सर्व लोकना एक साक्षी
(
केवळ ज्ञाताद्रष्टा) छे. २८८.
परिणामपूर्वक वचन जीवने बंधकारण थाय छे;
परिणाम विरहित वचन तेथी बंध थाय न ज्ञानीने. १७३.
अभिलाषपूर्वक वचन जीवने बंधकारण थाय छे;
अभिलाष विरहित वचन तेथी बंध थाय न ज्ञानीने. १७४.
अन्वयार्थ[परिणामपूर्ववचनं] परिणामपूर्वक (मनपरिणामपूर्वक) वचन [जीवस्य
च] जीवने [बंधकारणं] बंधनुं कारण [भवति] छे; [परिणामरहितवचनं] (ज्ञानीने)

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३४२
]
नियमसार
[ भगवानश्रीकुंदकुंद-
इह हि ज्ञानिनो बंधाभावस्वरूपमुक्त म्
सम्यग्ज्ञानी जीवः क्वचित् कदाचिदपि स्वबुद्धिपूर्वकं वचनं न वक्ति
स्वमनःपरिणामपूर्वकमिति यावत कुतः ? अमनस्काः केवलिनः इति वचनात अतः
कारणाज्जीवस्य मनःपरिणतिपूर्वकं वचनं बंधकारणमित्यर्थः, मनःपरिणामपूर्वकं वचनं केवलिनो
न भवति; ईहापूर्वं वचनमेव साभिलाषात्मकजीवस्य बंधकारणं भवति, केवलि-
मुखारविन्दविनिर्गतो दिव्यध्वनिरनीहात्मकः समस्तजनहृदयाह्लादकारणम्; ततः सम्यग्ज्ञानिनो
बंधाभाव इति
परिणामरहित वचन होय छे [तस्मात्] तेथी [ज्ञानिनः] ज्ञानीने (केवळज्ञानीने) [हि]
खरेखर [बंधः न] बंध नथी.
[ईहापूर्वं] इच्छापूर्वक [वचनं] वचन [जीवस्य च] जीवने [बंधकारणं] बंधनुं कारण
[भवति] छे; [ईहारहितं वचनं] (ज्ञानीने) इच्छारहित वचन होय छे [तस्मात्] तेथी
[ज्ञानिनः] ज्ञानीने (केवळज्ञानीने) [हि] खरेखर [बंधः न] बंध नथी.
टीकाअहीं खरेखर ज्ञानीने (केवळज्ञानीने) बंधना अभावनुं स्वरूप कह्युं
छे.
सम्यग्ज्ञानी (केवळज्ञानी) जीव क्यांय क्यारेय स्वबुद्धिपूर्वक अर्थात् स्वमन-
परिणामपूर्वक वचन बोलतो नथी. केम? ‘अमनस्काः केवलिनः (केवळीओ मनरहित छे)’
एवुं (शास्त्रनुं) वचन होवाथी. आ कारणथी (एम समजवुं के)जीवने मनपरिणतिपूर्वक
वचन बंधनुं कारण छे एवो अर्थ छे अने मनपरिणतिपूर्वक वचन तो केवळीने होतुं
नथी; (वळी) इच्छापूर्वक वचन ज
*साभिलाषस्वरूप जीवने बंधनुं कारण छे अने
केवळीना मुखारविंदमांथी नीकळतो, समस्त जनोनां हृदयने आह्लादना कारणभूत
दिव्यध्वनि तो अनिच्छात्मक (इच्छारहित) होय छे; माटे सम्यग्ज्ञानीने (केवळज्ञानीने)
बंधनो अभाव छे.
[हवे आ १७३-१७४मी गाथाओनी टीका पूर्ण करतां टीकाकार मुनिराज त्रण
श्लोक कहे छेः]
*साभिलाषस्वरूप = जेनुं स्वरूप साभिलाष (इच्छायुक्त) होय एवा

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कहानजैनशास्त्रमाळा ]
शुद्धोपयोग अधिकार
[ ३४३
(मंदाक्रांता)
ईहापूर्वं वचनरचनारूपमत्रास्ति नैव
तस्मादेषः प्रकटमहिमा विश्वलोकैकभर्ता
अस्मिन् बंधः कथमिव भवेद्द्रव्यभावात्मकोऽयं
मोहाभावान्न खलु निखिलं रागरोषादिजालम् ।।२८9।।
(मंदाक्रांता)
एको देवस्त्रिभुवनगुरुर्नष्टकर्माष्टकार्धः
सद्बोधस्थं भुवनमखिलं तद्गतं वस्तुजालम्
आरातीये भगवति जिने नैव बंधो न मोक्षः
तस्मिन् काचिन्न भवति पुनर्मूर्च्छना चेतना च
।।9।।
(मंदाक्रांता)
न ह्येतस्मिन् भगवति जिने धर्मकर्मप्रपंचो
रागाभावादतुलमहिमा राजते वीतरागः
एषः श्रीमान् स्वसुखनिरतः सिद्धिसीमन्तिनीशो
ज्ञानज्योतिश्छुरितभुवनाभोगभागः समन्तात
।।9।।
[श्लोकार्थ] आमनामां (केवळी भगवानमां) इच्छापूर्वक वचनरचनानुं स्वरूप
नथी ज; तेथी तेओ प्रगट-महिमावंत छे अने समस्त लोकना एक (अनन्य) नाथ छे. तेमने
द्रव्यभावस्वरूप एवो आ बंध कई रीते थाय? (कारण के) मोहना अभावने लीधे तेमने
खरेखर समस्त रागद्वेषादि समूह तो छे नहि. २८९.
[श्लोकार्थ] त्रण लोकना जेओ गुरु छे, चार कर्मनो जेमणे नाश कर्यो छे अने
आखो लोक तथा तेमां रहेलो पदार्थसमूह जेमना सद्ज्ञानमां स्थित छे, ते (जिन भगवान)
एक ज देव छे. ते निकट (साक्षात
्) जिन भगवानने विषे नथी बंध के नथी मोक्ष, तेम
ज तेमनामां नथी कोई मूर्छा के नथी कोई चेतना (कारण के द्रव्यसामान्यनो पूर्ण आश्रय
छे.) २९०.
[श्लोकार्थ] आ जिन भगवानमां खरेखर धर्म अने कर्मनो प्रपंच नथी (अर्थात
१. मूर्छा = बेभानपणुं; बेशुद्धि; अज्ञानदशा.
२. चेतना = भानवाळी दशा; शुद्धि; ज्ञानदशा.

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३४
४ ]
नियमसार
[ भगवानश्रीकुंदकुंद-
ठाणणिसेज्जविहारा ईहापुव्वं ण होइ केवलिणो
तम्हा ण होइ बंधो साक्खट्ठं मोहणीयस्स ।।१७५।।
स्थाननिषण्णविहारा ईहापूर्वं न भवन्ति केवलिनः
तस्मान्न भवति बंधः साक्षार्थं मोहनीयस्य ।।१७५।।
केवलिभट्टारकस्यामनस्कत्वप्रद्योतनमेतत
भगवतः परमार्हन्त्यलक्ष्मीविराजमानस्य केवलिनः परमवीतरागसर्वज्ञस्य ईहापूर्वकं
न किमपि वर्तनम्; अतः स भगवान् न चेहते मनःप्रवृत्तेरभावात्; अमनस्काः
केवलिनः इति वचनाद्वा न तिष्ठति नोपविशति न चेहापूर्वं श्रीविहारादिकं करोति
साधकदशामां जे शुद्धि अने अशुद्धिना भेदप्रभेदो वर्तता होय छे ते जिन भगवानमां नथी);
रागना अभावने लीधे अतुल-महिमावंत एवा ते (भगवान) वीतरागपणे विराजे छे. ते
श्रीमान (शोभावंत भगवान) निजसुखमां लीन छे, मुक्तिरूपी स्त्रीना नाथ छे अने
ज्ञानज्योति वडे तेमणे लोकना विस्तारने सर्वतः छाई दीधो छे. २९१.
अभिलाषपूर्व विहार, आसन, स्थान नहि जिनदेवने,
तेथी नथी त्यां बंध; बंधन मोहवश साक्षार्थने. १७५.
अन्वयार्थ[केवलिनः] केवळीने [स्थाननिषप्णविहाराः] ऊभा रहेवुं, बेसवुं अने
विहार [ईहापूर्वं] इच्छापूर्वक [न भवन्ति] होतां नथी, [तस्मात्] तेथी [बंधः न भवति]
तेमने बंध नथी; [मोहनीयस्य] मोहनीयवश जीवने [साक्षार्थम्] इन्द्रियविषयसहितपणे बंध
थाय छे.
टीकाआ, केवळीभट्टारकने मनरहितपणानुं प्रकाशन छे (अर्थात् अहीं केवळी-
भगवाननुं मनरहितपणुं दर्शाव्युं छे).
अर्हंतयोग्य परम लक्ष्मीथी विराजमान, परमवीतराग सर्वज्ञ केवळीभगवानने
इच्छापूर्वक कांई पण वर्तन होतुं नथी; तेथी ते भगवान (कांई) इच्छता नथी, कारण के
मनप्रवृत्तिनो अभाव छे; अथवा, तेओ इच्छापूर्वक ऊभा रहेता नथी, बेसता नथी के
श्रीविहारादिक करता नथी, कारण के
‘अमनस्काः केवलिनः (केवळीओ मनरहित छे)’ एवुं
शास्त्रनुं वचन छे. माटे ते तीर्थंकर-परमदेवने द्रव्यभावस्वरूप चतुर्विध बंध (प्रकृतिबंध,

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कहानजैनशास्त्रमाळा ]
शुद्धोपयोग अधिकार
[ ३४५
ततस्तस्य तीर्थकरपरमदेवस्य द्रव्यभावात्मकचतुर्विधबंधो न भवति स च बंधः
पुनः किमर्थं जातः कस्य संबंधश्च ? मोहनीयकर्मविलासविजृंभितः, अक्षार्थमिन्द्रियार्थं तेन
सह यः वर्तत इति साक्षार्थं मोहनीयस्य वशगतानां साक्षार्थप्रयोजनानां संसारिणामेव
बंध इति
तथा चोक्तं श्रीप्रवचनसारे
‘‘ठाणणिसेज्जविहारा धम्मुवदेसो य णियदयो तेसिं
अरहंताणं काले मायाचारो व्व इत्थीणं ।।’’
(शार्दूलविक्रीडित)
देवेन्द्रासनकंपकारणमहत्कैवल्यबोधोदये
मुक्ति श्रीललनामुखाम्बुजरवेः सद्धर्मरक्षामणेः
सर्वं वर्तनमस्ति चेन्न च मनः सर्वं पुराणस्य तत
सोऽयं नन्वपरिप्रमेयमहिमा पापाटवीपावकः ।।9।।
प्रदेशबंध, स्थितिबंध अने अनुभागबंध) थतो नथी.
वळी, ते बंध (१) कया कारणे थाय छे अने (२) कोने थाय छे? (१) बंध
मोहनीयकर्मना विलासथी उत्पन्न थाय छे. (२) ‘अक्षार्थ’ एटले इन्द्रियार्थ
(इन्द्रियविषय); अक्षार्थ सहित होय ते ‘साक्षार्थ’; मोहनीयने वश थयेला, साक्षार्थप्रयोजन
(
इन्द्रियविषयरूप प्रयोजनवाळा) संसारीओने ज बंध थाय छे.
एवी रीते (श्रीमद्भगवत्कुंदकुंदाचार्यदेवप्रणीत) श्री प्रवचनसारमां (४४मी गाथा
द्वारा) कह्युं छे केः
‘‘[गाथार्थः] ते अर्हंतभगवंतोने ते काळे ऊभा रहेवुं, बेसवुं, विहार अने
धर्मोपदेश, स्त्रीओने मायाचारनी माफक, स्वाभाविक जप्रयत्न विना जहोय
छे.’’
[हवे आ १७५मी गाथानी टीका पूर्ण करतां टीकाकार मुनिराज श्लोक कहे
छेः]
[श्लोकार्थ] देवेंद्रोनां आसन कंपायमान थवाना कारणभूत महा केवळज्ञाननो

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३४
६ ]
नियमसार
[ भगवानश्रीकुंदकुंद-
आउस्स खयेण पुणो णिण्णासो होइ सेसपयडीणं
पच्छा पावइ सिग्घं लोयग्गं समयमेत्तेण ।।१७६।।
आयुषः क्षयेण पुनः निर्नाशो भवति शेषप्रकृतीनाम्
पश्चात्प्राप्नोति शीघ्रं लोकाग्रं समयमात्रेण ।।१७६।।
शुद्धजीवस्य स्वभावगतिप्राप्त्युपायोपन्यासोऽयम्
स्वभावगतिक्रियापरिणतस्य षटकापक्रमविहीनस्य भगवतः सिद्धक्षेत्राभिमुखस्य
ध्यानध्येयध्यातृतत्फलप्राप्तिप्रयोजनविकल्पशून्येन स्वस्वरूपाविचलस्थितिरूपेण परमशुक्लध्यानेन
आयुःकर्मक्षये जाते वेदनीयनामगोत्राभिधानशेषप्रकृतीनां निर्नाशो भवति
शुद्धनिश्चयनयेन
उदय थतां, जे मुक्तिलक्ष्मीरूपी स्त्रीना मुखकमळना सूर्य छे अने सद्धर्मना *रक्षामणि छे
एवा पुराण पुरुषने बधुं वर्तन भले होय तोपण मन सघळुंय होतुं नथी; तेथी तेओ
(केवळज्ञानी पुराणपुरुष) खरेखर अगम्य महिमावंत छे अने पापरूपी वनने बाळनार
अग्नि समान छे. २९२.
आयुक्षये त्यां शेष सर्वे कर्मनो क्षय थाय छे;
पछी समयमात्रे शीघ्र ते लोकाग्र पहोंची जाय छे. १७६.
अन्वयार्थ[पुनः] वळी (केवळीने) [आयुषः क्षयेण] आयुना क्षयथी [शेषप्रकृतीनाम्]
शेष प्रकृतिओनो [निर्नाशः] संपूर्ण नाश [भवति] थाय छे; [पश्चात्] पछी ते [शीघ्रं] शीघ्र
[समयमात्रेण] समयमात्रमां [लोकाग्रं] लोकाग्रे [प्राप्नोति] पहोंचे छे.
टीकाआ, शुद्ध जीवने स्वभावगतिनी प्राप्ति थवाना उपायनुं कथन छे.
स्वभावगतिक्रियारूपे परिणत, छ +अपक्रमथी रहित, सिद्धक्षेत्रसंमुख भगवानने परम
शुक्लध्यान वडेके जे (शुक्लध्यान) ध्यान-ध्येय-ध्याता संबंधी, तेनी फळप्राप्ति संबंधी अने
तेना प्रयोजन संबंधी विकल्पो विनानुं छे अने निज स्वरूपमां अविचळ स्थितिरूप छे तेना
*रक्षामणि = आपत्तिओथी अथवा पिशाच वगेरेथी पोतानी जातने बचाववा माटे पहेरवामां आवतो
मणि. (केवळीभगवान सद्धर्मना रक्षण माटे
असद्धर्मथी बचवा माटेरक्षामणि छे.)
+संसारी जीवने अन्य भवमां जतां ‘छ दिशाओमां गमन’ थाय छे तेने ‘छ अपक्रम’ कहेवामां
आवे छे.

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कहानजैनशास्त्रमाळा ]
शुद्धोपयोग अधिकार
[ ३४७
स्वस्वरूपे सहजमहिम्नि लीनोऽपि व्यवहारेण स भगवान् क्षणार्धेन लोकाग्रं प्राप्नोतीति
(अनुष्टुभ्)
षटकापक्रमयुक्तानां भविनां लक्षणात् पृथक्
सिद्धानां लक्षणं यस्मादूर्ध्वगास्ते सदा शिवाः ।।9।।
(मंदाक्रांता)
बन्धच्छेदादतुलमहिमा देवविद्याधराणां
प्रत्यक्षोऽद्य स्तवनविषयो नैव सिद्धः प्रसिद्धः
लोकस्याग्रे व्यवहरणतः संस्थितो देवदेवः
स्वात्मन्युच्चैरविचलतया निश्चयेनैवमास्ते
।।9।।
(अनुष्टुभ्)
पंचसंसारनिर्मुक्तान् पंचसंसारमुक्त ये
पंचसिद्धानहं वंदे पंचमोक्षफलप्रदान् ।।9।।
वडेआयुकर्मनो क्षय थतां, वेदनीय, नाम ने गोत्र नामनी शेष प्रकृतिओनो संपूर्ण नाश
थाय छे (अर्थात् भगवानने शुक्लध्यान वडे आयुकर्मनो क्षय थतां बाकीनां त्रण कर्मोनो पण
क्षय थाय छे अने सिद्धक्षेत्र तरफ स्वभावगतिक्रिया थाय छे). शुद्धनिश्चयनयथी सहज-
महिमावाळा निज स्वरूपमां लीन होवा छतां व्यवहारे ते भगवान अर्ध क्षणमां
(समयमात्रमां) लोकाग्रे पहोंचे छे.
[हवे आ १७६ मी गाथानी टीका पूर्ण करतां टीकाकार मुनिराज त्रण श्लोक कहे छेः]
[श्लोकार्थ
] जेओ छ अपक्रम सहित छे एवा भववाळा जीवोना
(संसारीओना) लक्षणथी सिद्धोनुं लक्षण भिन्न छे, तेथी ते सिद्धो ऊर्ध्वगामी छे अने सदा
शिव (निरंतर सुखी) छे. २९३.
[श्लोकार्थ] बंधनो छेद थवाथी जेमनो अतुल महिमा छे एवा (अशरीरी अने
लोकाग्रस्थित) सिद्धभगवान हवे देवो अने विद्याधरोना प्रत्यक्ष स्तवननो विषय नथी ज
एम प्रसिद्ध छे. ते देवाधिदेव व्यवहारथी लोकना अग्रे सुस्थित छे अने निश्चयथी निज
आत्मामां एम ने एम अत्यंत अविचळपणे रहे छे. २९४.
[श्लोकार्थ] (द्रव्य, क्षेत्र, काळ, भव ने भावएवां पांच परावर्तनरूप) पांच

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३४
८ ]
नियमसार
[ भगवानश्रीकुंदकुंद-
जाइजरमरणरहियं परमं कम्मट्ठवज्जियं सुद्धं
णाणाइचउसहावं अक्खयमविणासमच्छेयं ।।१७७।।
जातिजरामरणरहितं परमं कर्माष्टवर्जितं शुद्धम्
ज्ञानादिचतुःस्वभावं अक्षयमविनाशमच्छेद्यम् ।।१७७।।
कारणपरमतत्त्वस्वरूपाख्यानमेतत
निसर्गतः संसृतेरभावाज्जातिजरामरणरहितम्, परमपारिणामिकभावेन परमस्वभाव-
त्वात्परमम्, त्रिकालनिरुपाधिस्वरूपत्वात् कर्माष्टकवर्जितम्, द्रव्यभावकर्मरहितत्वाच्छुद्धम्,
सहजज्ञानसहजदर्शनसहजचारित्रसहजचिच्छक्ति मयत्वाज्ज्ञानादिचतुःस्वभावम्, सादिसनिधन-
प्रकारना संसारथी मुक्त, पांच प्रकारना मोक्षरूपी फळने देनारा (अर्थात् द्रव्यपरावर्तन,
क्षेत्रपरावर्तन, काळपरावर्तन, भवपरावर्तन ने भावपरावर्तनथी मुक्त करनारा), पंचप्रकार
सिद्धोने (अर्थात
् पांच प्रकारनी मुक्तिनेसिद्धिनेप्राप्त सिद्धभगवंतोने) हुं पांच प्रकारना
संसारथी मुक्त थवा माटे वंदुं छुं. २९५.
कर्माष्टवर्जित, परम, जन्मजरामरणहीन, शुद्ध छे,
ज्ञानादि चार स्वभाव छे, अक्षय, अनाश, अछेद्य छे. १७७.
अन्वयार्थ(परमात्मतत्त्व) [जातिजरामरणरहितम्] जन्म-जरा-मरण रहित, [परमम्]
परम, [कर्माष्टवर्जितम्] आठ कर्म विनानुं, [शुद्धम्] शुद्ध, [ज्ञानादिचतुःस्वभावम्] ज्ञानादिक चार
स्वभाववाळुं, [अक्षयम्] अक्षय, [अविनाशम्] अविनाशी अने [अच्छेद्यम्] अच्छेद्य छे.
टीका(जेनो संपूर्ण आश्रय करवाथी सिद्ध थवाय छे एवा) कारणपरमतत्त्वना
स्वरूपनुं आ कथन छे.
(कारणपरमतत्त्व आवुं छेः) निसर्गथी (स्वभावथी) संसारनो अभाव होवाने
लीधे जन्म-जरा-मरण रहित छे; परम-पारिणामिकभाव वडे परमस्वभाववाळुं होवाने लीधे
परम छे; त्रणे काळे निरुपाधि-स्वरूपवाळुं होवाने लीधे आठ कर्म विनानुं छे; द्रव्यकर्म अने
भावकर्म रहित होवाने लीधे शुद्ध छे; सहजज्ञान, सहजदर्शन, सहजचारित्र अने
सहजचित्शक्तिमय होवाने लीधे ज्ञानादिक चार स्वभाववाळुं छे; सादि-सांत, मूर्त
इन्द्रियात्मक विजातीय-विभावव्यंजनपर्याय रहित होवाने लीधे अक्षय छे; प्रशस्त-अप्रशस्त

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कहानजैनशास्त्रमाळा ]
शुद्धोपयोग अधिकार
[ ३४९
मूर्तेन्द्रियात्मकविजातीयविभावव्यंजनपर्यायवीतत्वादक्षयम्, प्रशस्ताप्रशस्तगतिहेतुभूतपुण्यपाप-
कर्मद्वन्द्वाभावादविनाशम्, वधबंधच्छेदयोग्यमूर्तिमुक्त त्वादच्छेद्यमिति
(मालिनी)
अविचलितमखंडज्ञानमद्वन्द्वनिष्ठं
निखिलदुरितदुर्गव्रातदावाग्निरूपम्
भज भजसि निजोत्थं दिव्यशर्मामृतं त्वं
सकलविमलबोधस्ते भवत्येव तस्मात
।।9।।
अव्वाबाहमणिंदियमणोवमं पुण्णपावणिम्मुक्कं
पुणरागमणविरहियं णिच्चं अचलं अणालंबं ।।१७८।।
अव्याबाधमतीन्द्रियमनुपमं पुण्यपापनिर्मुक्त म्
पुनरागमनविरहितं नित्यमचलमनालंबम् ।।१७८।।
गतिना हेतुभूत पुण्य-पापकर्मरूप द्वंद्वनो अभाव होवाने लीधे अविनाशी छे; वध, बंध अने
छेदने योग्य मूर्तिथी (मूर्तिकताथी) रहित होवाने लीधे अच्छेद्य छे.
[हवे आ १७७मी गाथानी टीका पूर्ण करतां टीकाकार मुनिराज श्लोक कहे
छेः]
[श्लोकार्थ] अविचळ, अखंडज्ञानरूप, अद्वंद्वनिष्ठ (रागद्वेषादि द्वंद्वमां नहि
रहेल) अने समस्त पापना दुस्तर समूहने बाळवामां दावानळ समानएवा स्वोत्पन्न
(पोताथी उत्पन्न थता) दिव्यसुखामृतने (दिव्यसुखामृतस्वभावी आत्मतत्त्वने)के जेने
तुं भजी रह्यो छे तेनेभज; तेथी तने सकळ-विमळ ज्ञान (केवळज्ञान) थशे
ज. २९६.
अनुपम, अतींद्रिय, पुण्यपापविमुक्त, अव्याबाध छे,
पुनरागमन विरहित, निरालंबन, सुनिश्चळ, नित्य छे. १७८.
अन्वयार्थ(परमात्मतत्त्व) [अव्याबाधम्] अव्याबाध, [अतीन्द्रियम्] अतींद्रिय,
[अनुपमम्] अनुपम, [पुण्यपापनिर्मुक्त म्] पुण्यपाप विनानुं, [पुनरागमनविरहितम्] पुनरागमन

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३५
० ]
नियमसार
[ भगवानश्रीकुंदकुंद-
अत्रापि निरुपाधिस्वरूपलक्षणपरमात्मतत्त्वमुक्त म्
अखिलदुरघवीरवैरिवरूथिनीसंभ्रमागोचरसहजज्ञानदुर्गनिलयत्वादव्याबाधम्, सर्वात्म-
प्रदेशभरितचिदानन्दमयत्वादतीन्द्रियम्, त्रिषु तत्त्वेषु विशिष्टत्वादनौपम्यम्, संसृति-
पुरंध्रिकासंभोगसंभवसुखदुःखाभावात्पुण्यपापनिर्मुक्त म्, पुनरागमनहेतुभूतप्रशस्ताप्रशस्तमोह-
रागद्वेषाभावात्पुनरागमनविरहितम्, नित्यमरणतद्भवमरणकारणकलेवरसंबन्धाभावान्नित्यम्,
निजगुणपर्यायप्रच्यवनाभावादचलम्, परद्रव्यावलम्बनाभावादनालम्बमिति
तथा चोक्तं श्रीमदमृतचंद्रसूरिभिः
रहित, [नित्यम्] नित्य, [अचलम्] अचळ अने [अनालंबम्] निरालंब छे.
टीकाअहीं पण, निरुपाधि स्वरूप जेनुं लक्षण छे एवुं परमात्मतत्त्व कह्युं
छे.
(परमात्मतत्त्व आवुं छेः) समस्त दुष्ट अघरूपी वीर शत्रुओनी सेनाना
धांधलने अगोचर एवा सहजज्ञानरूपी किल्लामां रहेठाण होवाने लीधे अव्याबाध
(निर्विघ्न) छे; सर्व आत्मप्रदेशे भरेला चिदानंदमयपणाने लीधे अतींद्रिय छे; त्रण
तत्त्वोमां विशिष्ट होवाने लीधे (बहिरात्मतत्त्व, अंतरात्मतत्त्व अने परमात्मतत्त्व
त्रणेमां विशिष्ट
खास प्रकारनुंउत्तम होवाने लीधे) अनुपम छे; संसाररूपी स्त्रीना
संभोगथी उत्पन्न थतां सुखदुःखनो अभाव होवाने लीधे पुण्यपाप विनानुं छे;
पुनरागमनना हेतुभूत प्रशस्त-अप्रशस्त मोहरागद्वेषनो अभाव होवाने लीधे
पुनरागमन रहित छे; नित्य मरणना अने ते भव संबंधी मरणना कारणभूत
कलेवरना (शरीरना) संबंधनो अभाव होवाने लीधे नित्य छे; निज गुणो अने
पर्यायोथी च्युत नहि थतुं होवाने लीधे अचळ छे; परद्रव्यना अवलंबननो अभाव
होवाने लीधे निरालंब छे.
एवी रीते (आचार्यदेव) श्रीमद् अमृतचंद्रसूरिए (श्री समयसारनी आत्मख्याति
नामनी टीकामां १३८मा श्लोक द्वारा) कह्युं छे केः
१. अध्यात्मशास्त्रोमां घणां स्थळे पाप तेम ज पुण्य बन्नेने ‘अघ’ अथवा ‘पाप’ कहेवामां आवे छे.
२. पुनरागमन = (चार गतिमांनी कोई गतिमां) पाछा आववुं ते; फरीने जन्मवुं ते.
३. नित्य मरण = समये समये थतो आयुकर्मना निषेकोनो क्षय

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कहानजैनशास्त्रमाळा ]
शुद्धोपयोग अधिकार
[ ३५१
(मंदाक्रांता)
‘‘आसंसारात्प्रतिपदममी रागिणो नित्यमत्ताः
सुप्ता यस्मिन्नपदमपदं तद्विबुध्यध्वमंधाः
एतैतेतः पदमिदमिदं यत्र चैतन्यधातुः
शुद्धः शुद्धः स्वरसभरतः स्थायिभावत्वमेति
।।’’
तथा हि
(शार्दूलविक्रीडित)
भावाः पंच भवन्ति येषु सततं भावः परः पंचमः
स्थायी संसृतिनाशकारणमयं सम्यग्
द्रशां गोचरः
तं मुक्त्वाखिलरागरोषनिकरं बुद्ध्वा पुनर्बुद्धिमान्
एको भाति कलौ युगे मुनिपतिः पापाटवीपावकः
।।9।।
‘‘[श्लोकार्थ] (श्री गुरु संसारी भव्य जीवोने संबोधे छे केः) हे अंध
प्राणीओ! अनादि संसारथी मांडीने पर्याये पर्याये आ रागी जीवो सदाय मत्त वर्तता थका
जे पदमां सूता छे
ऊंघे छे ते पद अर्थात् स्थान अपद छेअपद छे, (तमारुं स्थान
नथी,) एम तमे समजो. (बे वार कहेवाथी अति करुणाभाव सूचित थाय छे.) आ तरफ
आवो
आ तरफ आवो, (अहीं निवास करो,) तमारुं पद आ छेआ छे ज्यां शुद्ध-
शुद्ध चैतन्यधातु निज रसनी अतिशयताने लीधे स्थायीभावपणाने प्राप्त छे अर्थात् स्थिर
छेअविनाशी छे. (अहीं ‘शुद्ध’ शब्द बे वार कह्यो छे ते द्रव्य अने भाव बन्नेनी शुद्धता
सूचवे छे. सर्व अन्यद्रव्योथी जुदो होवाने लीधे आत्मा द्रव्ये शुद्ध छे अने परना निमित्ते
थता पोताना भावोथी रहित होवाने लीधे भावे शुद्ध छे.)’’
वळी (आ १७८ मी गाथानी टीका पूर्ण करतां टीकाकार मुनिराज श्लोक कहे छे)ः
[श्लोकार्थ] भावो पांच छे, जेमां आ परम पंचम भाव (परम पारिणामिक
भाव) निरंतर स्थायी छे, संसारना नाशनुं कारण छे अने सम्यग्द्रष्टिओने गोचर छे.
बुद्धिमान पुरुष समस्त रागद्वेषना समूहने छोडीने तेम ज ते परम पंचम भावने जाणीने,
एकलो, कळियुगमां पापवनना अग्निरूप मुनिवर तरीके शोभे छे (अर्थात
् जे बुद्धिमान
पुरुष परम पारिणामिक भावनो उग्रपणे आश्रय करे छे, ते ज एक पुरुष पापवनने
बाळवामां अग्नि समान मुनिवर छे). २९७.