Niyamsar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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कहानजैनशास्त्रमाळा ]
व्यवहारचारित्र अधिकार
[ ११७

अत्रेर्यासमितिस्वरूपमुक्त म्

यः परमसंयमी गुरुदेवयात्रादिप्रशस्तप्रयोजनमुद्दिश्यैकयुगप्रमाणं मार्गम् अवलोकयन् स्थावरजंगमप्राणिपरिरक्षार्थं दिवैव गच्छति, तस्य खलु परमश्रमणस्येर्यासमितिर्भवति व्यवहारसमितिस्वरूपमुक्त म् इदानीं निश्चयसमितिस्वरूपमुच्यते अभेदानुपचाररत्नत्रयमार्गेण परमधर्मिणमात्मानं सम्यग् इता परिणतिः समितिः अथवा निजपरमतत्त्वनिरतसहज- परमबोधादिपरमधर्माणां संहतिः समितिः इति निश्चयव्यवहारसमितिभेदं बुद्ध्वा तत्र परमनिश्चयसमितिमुपयातु भव्य इति [तस्य]


तेने [ईर्यासमितिः] ईर्यासमिति [भवेत] होय छे.

टीकाःअहीं (आ गाथामां) ईर्यासमितिनुं स्वरूप कह्युं छे.

जे *परमसंयमी गुरुयात्रा (गुरु पासे जवुं), देवयात्रा (देव पासे जवुं) वगेरे प्रशस्त प्रयोजननो उद्देश राखीने एक धोंसरा जेटलो मार्ग जोतो जोतो स्थावर तथा जंगम प्राणीओनी परिरक्षा (समस्त प्रकारे रक्षा) अर्थे दिवसे ज चाले छे, ते परमश्रमणने ईर्यासमिति होय छे. (आ प्रमाणे) व्यवहारसमितिनुं स्वरूप कहेवामां आव्युं.

हवे निश्चयसमितिनुं स्वरूप कहेवामां आवे छेः अभेद-अनुपचार-रत्नत्रयरूपी मार्गे परमधर्मी एवा (पोताना) आत्मा प्रत्ये सम्यक् ‘इति’ (-गति) अर्थात् परिणति ते समिति छे; अथवा, निज परमतत्त्वमां लीन सहज परमज्ञानादिक परमधर्मोनी संहति (-मिलन, संगठन) ते समिति छे.

आ प्रमाणे निश्चय अने व्यवहाररूप समितिभेदो जाणीने तेमां (-ते बेमांथी) परमनिश्चयसमितिने भव्य जीव प्राप्त करो.

[हवे ६१मी गाथानी टीका पूर्ण करतां टीकाकार मुनिराज चार श्लोक कहे छेः]

*परमसंयमी मुनिने (अर्थात् मुनियोग्य शुद्धपरिणतिवाळा मुनिने) शुद्धपरिणतिनी साथे वर्ततो जे (हठ वगरनो) ईर्यासंबंधी (-गमनसंबंधी, चालवासंबंधी) शुभोपयोग ते व्यवहार
ईर्यासमिति छे. शुद्धपरिणति न होय त्यां शुभोपयोग हठ सहित होय छे; ते शुभोपयोग
तो व्यवहार समिति पण कहेवातो नथी. [आ ईर्यासमितिनी माफक अन्य समितिओनुं पण
समजी लेवुं.]