Niyamsar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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कहानजैनशास्त्रमाळा ]
व्यवहारचारित्र अधिकार
[ १२३

अशुद्धजीवानां विभावधर्मं प्रति व्यवहारनयस्योदाहरणमिदम्

इदानीं निश्चयस्योदाहृतिरुच्यते तद्यथा
‘‘जस्स अणेसणमप्पा तं पि तवो तप्पडिच्छगा समणा
अण्णं भिक्खमणेसणमध ते समणा अणाहारा ।।’’
तथा चोक्तं श्रीगुणभद्रस्वामिभिः
(मालिनी)
‘‘यमनियमनितान्तः शान्तबाह्यान्तरात्मा
परिणमितसमाधिः सर्वसत्त्वानुकम्पी
विहितहितमिताशी क्लेशजालं समूलं
दहति निहतनिद्रो निश्चिताध्यात्मसारः
।।’’

अशुद्ध जीवोना विभावधर्म विषे व्यवहारनयनुं आ (अवतरण करेली गाथामां) उदाहरण छे.

हवे (श्री प्रवचनसारनी २२७मी गाथा द्वारा) निश्चयनुं उदाहरण कहेवामां आवे छे. ते आ प्रमाणे

‘‘[गाथार्थः] जेनो आत्मा एषणारहित छे (अर्थात् जे अनशनस्वभावी आत्माने जाणतो होवाने लीधे स्वभावथी आहारनी इच्छा रहित छे) तेने ते पण तप छे; (वळी) तेने प्राप्त करवा माटे (अनशनस्वभावी आत्माने परिपूर्णपणे प्राप्त करवा माटे) प्रयत्न करनारा एवा जे श्रमणो तेमने अन्य (स्वरूपथी जुदी एवी) भिक्षा एषणा विना (-एषणादोष रहित) होय छे; तेथी ते श्रमणो अनाहारी छे.’’

एवी रीते (आचार्यवर) श्री गुणभद्रस्वामीए (आत्मानुशासनमां २२५मा श्लोक द्वारा) कह्युं छे केः

‘‘[श्लोकार्थः] जेणे अध्यात्मना सारनो निश्चय कर्यो छे, जे अत्यंत यमनियम सहित छे, जेनो आत्मा बहारथी अने अंदरथी शांत थयो छे, जेने समाधि परिणमी छे, जेने सर्व जीवो प्रत्ये अनुकंपा छे, जे विहित (शास्त्राज्ञा मुजबनुं)