Niyamsar-Gujarati (Devanagari transliteration). Shlok: 95 Gatha: 71.

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कहानजैनशास्त्रमाळा ]
व्यवहारचारित्र अधिकार
[ १३५
(अनुष्टुभ्)
‘‘उत्सृज्य कायकर्माणि भावं च भवकारणम्
स्वात्मावस्थानमव्यग्रं कायोत्सर्गः स उच्यते ।।’’
तथा हि
(अनुष्टुभ्)
अपरिस्पन्दरूपस्य परिस्पन्दात्मिका तनुः
व्यवहाराद्भवेन्मेऽतस्त्यजामि विकृतिं तनोः ।।9।।
घणघाइकम्मरहिया केवलणाणाइपरमगुणसहिया
चोत्तिसअदिसयजुत्ता अरिहंता एरिसा होंति ।।७१।।
घनघातिकर्मरहिताः केवलज्ञानादिपरमगुणसहिताः
चतुस्त्रिंशदतिशययुक्ता अर्हन्त ईद्रशा भवन्ति ।।७१।।

भगवतोऽर्हत्परमेश्वरस्य स्वरूपाख्यानमेतत आत्मगुणघातकानि घातिकर्माणि घनरूपाणि सान्द्रीभूतात्मकानि ज्ञानदर्शना-

‘‘[श्लोकार्थः] कायक्रियाओने तथा भवना कारणभूत (विकारी) भावने छोडीने अव्यग्रपणे निज आत्मामां स्थित रहेवुं, ते कायोत्सर्ग कहेवाय छे.’’

वळी (आ ७०मी गाथानी टीका पूर्ण करतां टीकाकार मुनिराज श्लोक कहे छे)ः

[श्लोकार्थः] अपरिस्पंदात्मक एवा मने परिस्पंदात्मक शरीर व्यवहारथी छे; तेथी हुं शरीरनी विकृतिने तजुं छुं. ९५.

घनघातिकर्म विहीन ने चोत्रीस अतिशय युक्त छे,
कैवल्यज्ञानादिक परमगुण युक्त श्री अर्हंत छे. ७१.

अन्वयार्थः[घनघातिकर्मरहिताः] घनघातीकर्म रहित, [केवलज्ञानादिपरमगुणसहिताः] केवळज्ञानादि परम गुणो सहित अने [चतुस्त्रिंशदतिशययुक्ताः] चोत्रीश अतिशय संयुक्त; [ईद्रशाः] आवा, [अर्हन्तः] अर्हंतो [भवन्ति] होय छे.

टीकाःआ, भगवान अर्हत् परमेश्वरना स्वरूपनुं कथन छे.

[भगवंत अर्हंतो केवा होय छे?] (१) जेओ आत्मगुणोनां घातक घातिकर्मो छे अने