पदविनतयमीशः प्रास्तकीनाशपाशः ।
जयति जगदधीशः चारुपद्मप्रभेशः ।।१००।।
भगवतां सिद्धिपरंपराहेतुभूतानां सिद्धपरमेष्ठीनां स्वरूपमत्रोक्त म् । निरवशेषेणान्तर्मुखाकारध्यानध्येयविकल्पविरहितनिश्चयपरमशुक्लध्यानबलेन नष्टाष्ट-
[श्लोकार्थः — ] कामदेवरूपी पर्वतने माटे (अर्थात् तेने तोडी नाखवामां) जेओ (वज्रधर) इन्द्र समान छे, कान्त (मनोहर) जेमनो कायप्रदेश छे, मुनिवरो जेमनां चरणमां नमे छे, यमना पाशनो जेमणे नाश कर्यो छे, दुष्ट पापरूपी वनने (बाळवा) माटे जेओ अग्नि छे, सर्व दिशाओमां जेमनी कीर्ति व्यापी गई छे अने जगतना जेओ अधीश (नाथ) छे, ते सुंदर पद्मप्रभेश जयवंत छे. १००.
अन्वयार्थः — [नष्टाष्टकर्मबन्धाः] आठ कर्मना बंधने जेमणे नष्ट करेल छे एवा, [अष्टमहागुणसमन्विताः] आठ महागुणो सहित, [परमाः] परम, [लोकाग्रस्थिताः] लोकना अग्रे स्थित अने [नित्याः] नित्य; — [ईद्रशाः] आवा, [ते सिद्धाः] ते सिद्धो [भवन्ति] होय छे.
टीकाः – सिद्धिना परंपराहेतुभूत एवा भगवंत सिद्धपरमेष्ठीओनुं स्वरूप अहीं कह्युं छे.
[भगवंत सिद्धो केवा होय छे?] (१) १निरवशेषपणे अंतर्मुखाकार, ध्यानध्येयना विकल्प रहित निश्चय-परमशुक्लध्यानना बळथी जेमणे आठ कर्मना बंधने नष्ट करेल छे एवा;
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१. निरवशेषपणे = अशेषतः; कांई बाकी राख्या विना; संपूर्णपणे; सर्वथा. [परम-शुक्लध्याननो आकार