त्यजतु परमतत्त्वाभ्यासनिष्णातचित्तः ।
भजतु भवविमुक्त्यै कोऽत्र दोषो मुनीशः ।।५9।।
इह हि शुद्धनिश्चयनयेन शुद्धजीवस्य समस्तसंसारविकारसमुदयो न समस्तीत्युक्त म् ।
[श्लोेकार्थ : — ] समस्त सुकृत (शुभ कर्म) भोगियोंके भोगका मूल है; परम तत्त्वके अभ्यासमें निष्णात चित्तवाले मुनीश्वर भवसे विमुक्त होने हेतु उस समस्त शुभ कर्मको छोड़ो और ❃
दोष है ? ५९।
गाथा : ४२ अन्वयार्थ : — [जीवस्य ] जीवको [चतुर्गतिभवसंभ्रमणं ] चार गतिके भवोंमें परिभ्रमण, [जातिजरामरणरोगशोकाः ] जन्म, जरा, मरण, रोग, शोक, [कुलयोनिजीवमार्गणस्थानानि च ] कुल, योनि, जीवस्थान और मार्गणास्थान [नो सन्ति ] नहीं है ।
टीका : — शुद्ध निश्चयनयसे शुद्ध जीवको समस्त संसारविकारोंका समुदाय नहीं है ऐसा यहाँ (इस गाथामें) कहा है ।
द्रव्यकर्म तथा भावकर्मका स्वीकार न होनेसे जीवको नारकत्व, तिर्यञ्चत्व, मनुष्यत्व
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