Niyamsar (Hindi). Gatha: 44.

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कहानजैनशास्त्रमाला ]शुद्धभाव अधिकार[ ९५
णिग्गंथो णीरागो णिस्सल्लो सयलदोसणिम्मुक्को
णिक्कामो णिक्कोहो णिम्माणो णिम्मदो अप्पा ।।४४।।
निर्ग्रन्थो नीरागो निःशल्यः सकलदोषनिर्मुक्त :
निःकामो निःक्रोधो निर्मानो निर्मदः आत्मा ।।४४।।

अत्रापि शुद्धजीवस्वरूपमुक्त म्

बाह्याभ्यन्तरचतुर्विंशतिपरिग्रहपरित्यागलक्षणत्वान्निर्ग्रन्थः सकलमोहरागद्वेषात्मक- चेतनकर्माभावान्नीरागः निदानमायामिथ्याशल्यत्रयाभावान्निःशल्यः शुद्धनिश्चयनयेन शुद्ध- जीवास्तिकायस्य द्रव्यभावनोकर्माभावात् सकलदोषनिर्मुक्त : शुद्धनिश्चयनयेन निजपरम- तत्त्वेऽपि वांछाभावान्निःकामः निश्चयनयेन प्रशस्ताप्रशस्तसमस्तपरद्रव्यपरिणतेरभावान्निः- क्रोधः निश्चयनयेन सदा परमसमरसीभावात्मकत्वान्निर्मानः निश्चयनयेन निःशेषतोऽन्तर्मुख-

गाथा : ४४ अन्वयार्थ :[आत्मा ] आत्मा [निर्ग्रन्थः ] निर्ग्रंथ [नीरागः ] निराग, [निःशल्यः ] निःशल्य, [सकलदोषनिर्मुक्तः ] सर्वदोषविमुक्त, [निःकामः ] निष्काम, [निःक्रोधः ] निःक्रोध, [निर्मानः ] निर्मान और [निर्मदः ] निर्मद है

टीका :यहाँ (इस गाथामें) भी शुद्ध जीवका स्वरूप कहा है

शुद्ध जीवास्तिकाय बाह्य-अभ्यंतर चौवीस परिग्रहके परित्यागस्वरूप होनेसे निग्रन्थ है; सकल मोह-राग-द्वेषात्मक चेतन कर्मके अभावके कारण निराग है; निदान, माया और मिथ्यात्वइन तीन शल्योंके अभावके कारण निःशल्य है; शुद्ध निश्चयनयसे शुद्ध जीवास्तिकायको द्रव्यकर्म, भावकर्म और नोकर्मका अभाव होनेके कारण सर्वदोषविमुक्त है; शुद्ध निश्चयनयसे निज परम तत्त्वकी भी वांछा न होनेसे निष्काम है; निश्चयनयसे प्रशस्त अप्रशस्त समस्त परद्रव्यपरिणतिका अभाव होनेके कारण निःक्रोध है; निश्चयनयसे सदा परम

परिग्रह है; एक मिथ्यात्व, चार कषाय और नौ नोकषाय ऐसा चौदह प्रकारका अभ्यंतर परिग्रह है
निर्ग्रन्थ है, निराग है, निःशल्य, जीव अमान है
सब दोष रहित, अक्रोध, निर्मद, जीव यह निष्काम है ।।४४।।

क्षेत्र, मकान, चाँदी, सोना, धन, धान्य, दासी, दास, वस्त्र और बरतनऐसा दस प्रकारका बाह्य