रयमिह परमार्थश्चेत्यतां नित्यमेकः ।
न्न खलु समयसारादुत्तरं किंचिदस्ति ।।’’
‘‘[श्लोकार्थ : — ] अधिक कहनेसे तथा अधिक दुर्विकल्पोंसे बस होओ, बस होओ; यहाँ इतना ही कहना है कि इस परम अर्थका एकका ही निरन्तर अनुभवन करो; क्योंकि निज रसके विस्तारसे पूर्ण जो ज्ञान उसके स्फु रायमान होनेमात्र जो समयसार ( – परमात्मा) उससे ऊँ चा वास्तवमें अन्य कुछ भी नहीं है ( – समयसारके अतिरिक्त अन्य कुछ भी सारभूत नहीं है ) ।’’
और (इस ८३वीं गाथाकी टीका पूर्ण करते हुए टीकाकार मुनिराज श्लोक कहते हैं ) : —
[श्लोकार्थ : — ] अति तीव्र मोहकी उत्पत्तिसे जो पूर्वमें उपार्जित (कर्म) उसका प्रतिक्रमण करके, मैं सद्बोधात्मक (सम्यग्ज्ञानस्वरूप) ऐसे उस आत्मामें आत्मासे नित्य वर्तता हूँ ।१११।
गाथा : ८४ अन्वयार्थ : — [विराधनं ] जो (जीव) विराधनको [विशेषेण ]
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