भूतद्रव्यभावकर्माभावादेकः, स एव निखिलक्रियाकांडाडंबरविविधविकल्पकोलाहल- निर्मुक्त सहजशुद्धज्ञानचेतनामतीन्द्रियं भुंजानः सन् शाश्वतो भूत्वा ममोपादेयरूपेण तिष्ठति, यस्त्रिकालनिरुपाधिस्वभावत्वात् निरावरणज्ञानदर्शनलक्षणलक्षितः कारणपरमात्मा; ये शुभाशुभकर्मसंयोगसंभवाः शेषा बाह्याभ्यन्तरपरिग्रहाः, स्वस्वरूपाद्बाह्यास्ते सर्वे; इति मम निश्चयः ।
सहजपरमचिच्चिन्तामणिर्नित्यशुद्धः ।
पानी भरनेके लिये जलप्रवाहसे परिपूर्ण नाली समान वर्तता हुआ जो शरीर उसकी उत्पत्तिमें हेतुभूत द्रव्यकर्म - भावकर्म रहित होनेसे एक है, और वही (कारणपरमात्मा) समस्त क्रियाकाण्डके आडम्बरके विविध विकल्परूप कोलाहलसे रहित सहजशुद्ध - ज्ञानचेतनाको अतीन्द्रियरूपसे भोगता हुआ शाश्वत रहकर मेरे लिये उपादेयरूपसे रहता है; जो शुभाशुभ कर्मके संयोगसे उत्पन्न होनेवाले शेष बाह्य - अभ्यंतर परिग्रह, वे सब निज स्वरूपसे बाह्य हैं । — ऐसा मेरा निश्चय है ।
[अब इस १०२वीं गाथाकी टीका पूर्ण करते हुए टीकाकार मुनिराज श्लोक कहते हैं : ]
[श्लोकार्थ : — ] अहो ! मेरा परमात्मा शाश्वत है, एक है, सहज परम चैतन्यचिन्तामणि है, सदा शुद्ध है और अनन्त निज दिव्य ज्ञानदर्शनसे समृद्ध है । ऐसा है तो फि र बहु प्रकारके बाह्य भावोंसे मुझे क्या फल है ? १३८।
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