Niyamsar (Hindi).

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नियमसार
[ भगवानश्रीकुंदकुंद-
(अनुष्टुभ्)
वाचं वाचंयमीन्द्राणां वक्त्रवारिजवाहनाम्
वन्दे नयद्वयायत्तवाच्यसर्वस्वपद्धतिम् ।।।।
(शालिनी)
सिद्धान्तोद्घश्रीधवं सिद्धसेनं
तर्काब्जार्कं भट्टपूर्वाकलंकम्
शब्दाब्धीन्दुं पूज्यपादं च वन्दे
तद्विद्याढयं वीरनन्दिं व्रतीन्द्रम्
।।।।

जिसने भवोंको जीता है उसकी मैं वन्दना करता हूँउसे प्रकाशमान ऐसे श्री जिन कहो,

[श्लोेकार्थ :]वाचंयमीन्द्रोंका (जिनदेवोंका) मुखकमल जिसका वाहन है और दो नयोंके आश्रयसे सर्वस्व कहनेकी जिसकी पद्धति है उस वाणीको (जिनभगवन्तोंकी स्याद्वादमुद्रित वाणीको) मैं वन्दन करता हूँ

[श्लोेकार्थ :] उत्तम सिद्धान्तरूपी श्रीके पति सिद्धसेन मुनीन्द्रको, तर्क कमलके सूर्य भट्ट अकलंक मुनीन्द्रको, शब्दसिन्धुके चन्द्र पूज्यपाद मुनीन्द्रको और तद्विद्यासे (सिद्धान्तादि तीनोंके ज्ञानसे) समृद्ध वीरनन्दि मुनीन्द्रको मैं वन्दन करता हूँ

श्री जिनभगवान (१) मोहरागद्वेषका अभाव होनेके कारण शोभनीकताको प्राप्त हैं, और (२) केवलज्ञानादिको प्राप्त कर लिया है इसलिये सम्पूर्णताको प्राप्त हैं; इसलिये उन्हें यहाँ सुगत कहा है

होनेसे उन्हें यहाँ गिरिधर कहा है

दिव्यवाणीके प्रकाशक होनेसे उन्हें यहाँ वागीश्वर कहा है

कहा गया है

२ ]

सुगत कहो, गिरिधर कहो, वागीश्वर कहो या शिव कहो

बुद्धको सुगत कहा जाता है सुगत अर्थात् (१) शोभनीकताको प्राप्त, अथवा (२) सम्पूर्णताको प्राप्त

कृष्णको गिरिधर (अर्थात् पर्वतको धारण कर रखनेवाले) कहा जाता है श्री जिनभगवान अनंतवीर्यवान

ब्रह्माको अथवा बृहस्पतिको वागीश्वर (अर्थात् वाणीके अधिपति) कहा जाता है श्री जिनभगवान

महेशको (शंकरको) शिव कहा जाता है श्री जिनभगवान कल्याणस्वरूप होनेसे उन्हें यहाँ शिव

वाचंयमीन्द्र = मुनियोंमें प्रधान अर्थात् जिनदेव; मौन सेवन करनेवालोंमें श्रेष्ठ अर्थात् जिनदेव; वाक्-
संयमियोंमें इन्द्र समान अर्थात् जिनदेव [वाचंयमी = मुनि; मौन सेवन करनेवाले; वाणीके संयमी
]

तर्ककमलके सूर्य = तर्करूपी कमलको प्रफु ल्लित करनेमें सूर्य समान

शब्दसिन्धुके चन्द्र = शब्दरूपी समुद्रको उछालनेमें चन्द्र समान