महासत्तेति । तत्र समस्तवस्तुविस्तरव्यापिनी महासत्ता, प्रतिनियतवस्तुव्यापिनी ह्यवान्तरसत्ता । समस्तव्यापकरूपव्यापिनी महासत्ता, प्रतिनियतैकरूपव्यापिनी ह्यवान्तरसत्ता । अनन्तपर्यायव्यापिनी महासत्ता, प्रतिनियतैकपर्यायव्यापिनी ह्यवान्तरसत्ता । अस्तीत्यस्य भावः अस्तित्वम् । अनेन अस्तित्वेन कायत्वेन सनाथाः पंचास्तिकायाः । कालद्रव्यस्यास्तित्वमेव, न कायत्वं, काया इव बहुप्रदेशाभावादिति ।
अर्थात् बहुप्रदेशोंवाले) होते हैं । अस्तिकाय पाँच हैं ।
अस्तित्व अर्थात् सत्ता । वह कैसी है ? महासत्ता और अवान्तरसत्ता — ऐसी वस्तुमें व्याप्त होनेवाली वह अवान्तरसत्ता है; समस्त व्यापक रूपमें व्याप्त होनेवाली वह महासत्ता है, प्रतिनियत एक रूपमें व्याप्त होनेवाली वह अवान्तरसत्ता है; अनन्त पर्यायोंमें व्याप्त होनेवाली वह महासत्ता है, प्रतिनियत एक पर्यायमें व्याप्त होनेवाली वह अवान्तरसत्ता है । पदार्थका ‘३अस्ति’ ऐसा भाव वह अस्तित्व है ।
इस अस्तित्वसे और कायत्वसे सहित पाँच अस्तिकाय हैं । कालद्रव्यको अस्तित्व ही है, कायत्व नहीं है, क्योंकि कायकी भाँति उसे बहुप्रदेशोंका अभाव है ।
[अब ३४वीं गाथाकी टीका पूर्ण करते हुए टीकाकार मुनिराज श्लोक कहते हैं :]
[श्लोेकार्थ : — ] इसप्रकार जिनमार्गरूपी रत्नाकरमेंसे पूर्वाचार्योंने प्रीतिपूर्वक षट्द्रव्यरूपी रत्नोंकी माला भव्योंके कण्ठाभरणके हेतु बाहर निकाली है ।५१।
७२ ]
१सप्रतिपक्ष है । वहाँ, समस्त वस्तुविस्तारमें व्याप्त होनेवाली वह महासत्ता है, २प्रतिनियत