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योगीन्दुदेवविरचितः
[ अधिकार-१ः दोहा-८८
१
स्वशुद्धात्मस्वरूपेण योजयतीति तात्पर्यार्थः ।।८७।। अथ —
८८) अप्पा वंदउ खवणु ण वि अप्पा गुरउ ण होइ ।
अप्पा लिंगिउ एक्कु ण वि णाणिउ जाणइ जोइ ।।८८।।
आत्मा वन्दकः क्षपणः नापि आत्मा गुरवः न भवति ।
आत्मा लिङ्गी एकः नापि ज्ञानी जानाति योगी ।।८८।।
आत्मा वन्दको बौद्धो न भवति, आत्मा क्षपणको दिगम्बरो न भवति, आत्मा
गुरवशब्दवाच्यः श्वेताम्बरो न भवति । आत्मा एकदण्डित्रिदण्डिहंसपरमहंससंज्ञाः संन्यासी शिखी
मुण्डी योगदण्डाक्षमालातिलककुलकघोषप्रभृतिवेषधारी नैकोऽपि कश्चिदपि लिङ्गी न भवति । तर्हि
वह ज्ञानस्वभावरूप जानता है ।।८७।।
आगे वंदक क्षपणकादि भेद भी जीवके नहीं हैं, ऐसा कहते हैं —
गाथा – ८८
अन्वयार्थ : — [आत्मा ] आत्मा [वन्दकः क्षपणः नापि ] बौद्धका आचार्य नहीं है,
दिगंबर भी नहीं है, [आत्मा ] आत्मा [गुरवः न भवति ] श्वेताम्बर भी नहीं है, [आत्मा ] आत्मा
[एकः अपि ] कोई भी [लिंगी ] वेशका धारी [न ] नहीं है, अर्थात् एकदंडी, त्रिदंडी, हंस,
परमहंस, सन्यासी, जटाधारी, मुंडित, रुद्राक्षकी माला, तिलक, कुलक, घोष वगैरेः भेषोंमें कोई
भी भेषधारी नहीं है, एक [ज्ञानी ] ज्ञानस्वरूप है, उस आत्माको [योगी ] ध्यानी [मुनि ]
ध्यानारूढ़ होकर [जानाति ] जानता है, ध्यान करता है
।
भावार्थ : — यद्यपि व्यवहारनयकर यह आत्मा वंदकादि अनेक भेषोंको धरता है, तो
भी शुद्धनिश्चयनयकर कोई भी भेष जीवके नहीं है, देहके है । यहाँ देहके आश्रयसे जो द्रव्यलिंग
हवे (वंदक, क्षपणादिक भेद पण जीवना नथी एम कहे छे)ः —
भावार्थः — जो के आत्माने व्यवहारनयथी वंदकादि लिंगी कहेवामां आवे छे तोपण
शुद्धनिश्चयनयथी कोई पण लिंग (वेश) जीवने नथी.
अहीं, ए भावार्थ छे के देहाश्रित द्रव्यलिंगने उपचरित असद्भूत व्यवहारनयथी जीवनुं
स्वरूप कहेवामां आवे छे अने वीतराग निर्विकल्प समाधिरूप भावलिंग जो के शुद्धात्मस्वरूपनुं
१. स्वशुद्धात्मस्वरूपेण ने बदले स्वशुद्धात्मस्वरूपेन एम होवुं जोईए.