अधिकार-१ः दोहा-८९ ]परमात्मप्रकाशः [ १४७
कथंभूतो भवति । ज्ञानी । तमात्मानं कोऽसौ जानाति योगी ध्यानीति । तथाहि — यद्यप्यात्मा
व्यवहारेण वन्दकादिलिङ्गी भण्यते तथापि शुद्धनिश्चयनयेनैकोऽपि लिङ्गी न भवतीति । अयमत्र
भावार्थः । देहाश्रितं १द्रव्यलिङ्गमुपचरितासद्भूतव्यवहारेण जीवस्वरूपं भण्यते, वीतरागनिर्विकल्प-
समाधिरूपं भावलिङ्गं तु यद्यपि शुद्धात्मस्वरूपसाधकत्वादुपचारेण शुद्धजीवस्वरूपं भण्यते, तथापि
सूक्ष्मशुद्धनिश्चयेन न भण्यत इति ।।८८।। अथ —
८९) अप्पा गुरु णवि सिस्सु णवि णवि सामिउ णवि भिच्चु ।
सूरउ कायरु होइ णवि णवि उत्तमु णवि णिच्चु ।।८९।।
आत्मा गुरुः नैव शिष्यः नैव नैव स्वामी नैव भृत्यः ।
शूरः कातरः भवति नैव नैव उत्तमः नैव नीचः ।।८९।।
है, वह उपचरितासद्भूतव्यवहारनयकर जीवका स्वरूप कहा जाता है, तो भी निश्चयनयकर
जीवका स्वरूप नहीं है । क्योंकि जब देह ही जीवकी नहीं, तो भेष कैसे हो सकता है ? इसलिये
द्रव्यलिंग तो सर्वथा ही नहीं है, और वीतरागनिर्विकल्पसमाधिरूप भावलिंग यद्यपि
शुद्धात्मस्वरूपका साधक है, इसलिये उपचारनयकर जीवका स्वरूप कहा जाता है, तो भी
परमसूक्ष्म शुद्धनिश्चयनयकर भावलिंग भी जीवका नहीं है । भावलिंग साधनरूप है, वह भी परम
अवस्थाका साधक नहीं है ।।८८।।
आगे यह गुरु शिष्यादिक भी नहीं है —
गाथा – ८९
अन्वयार्थ : — [आत्मा ] आत्मा [गुरुः नैव ] गुरु नहीं है, [शिष्य नैव ] शिष्य भी
नहीं है, [स्वामी नैव ] स्वामी भी नहीं है, [भृत्यः नैव ] नौकर नहीं है, [शूरः कातरः नैव ]
शूरवीर नहीं है, कायर नहीं है, [उत्तमः नैव ] उच्चकुली नहीं है, [नीचः नैव भवति ] और
नीचकुली भी नहीं है ।
साधक होवाथी उपचारथी शुद्ध जीवनुं स्वरूप कहेवामां आवे छे तोपण तेने सूक्ष्मशुद्धनिश्चयनयथी
शुद्ध जीवनुं स्वरूप कहेवामां आवतुं नथी. ८८.
हवे (आत्मा, गुरु, शिष्यादिक पण नथी एम कहे छे)ः —
भावार्थः — गुरुशिष्यादि संबंधो जो के व्यवहारनयथी जीवना स्वरूपो छे तोपण
२. पाठान्तरः — लिंगमु=लिंगमनु