Parmatma Prakash (Gujarati Hindi) (Devanagari transliteration). Gatha: 90 (Adhikar 1).

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१४८ ]
योगीन्दुदेवविरचितः
[ अधिकार-१ः दोहा-९०
आत्मा गुरुर्नैव भवति शिष्योऽपि न भवति नैव स्वामी नैव भृत्यः शूरो न भवति
कातरो हीनसत्त्वो नैव भवति नैवोत्तमः उत्तमकुलप्रसूतः नैव नीचो नीचकुलप्रसूत इति
तद्यथा गुरुशिष्यादिसंबन्धान् यद्यपि व्यवहारेण जीवस्वरूपांस्तथापि शुद्धनिश्चयेन
परमात्मद्रव्याद्भिन्नान् हेयभूतान् वीतरागपरमानन्दैकस्वशुद्धात्मोपलब्धेश्च्युतो बहिरात्मा
स्वात्मसंबद्धान् करोति तानेव वीतरागनिर्विकल्पसमाधिस्थो अन्तरात्मा परस्वरूपान् जानातीति
भावार्थः
।।८९।। अथ
९०) अप्पा माणुसु देउ ण वि अप्पा तिरिउ ण होइ
अप्पा णारउ कहिँ वि णवि णाणिउ जाणइ जोइ ।।९०।।
आत्मा मनुष्यः देवः नापि आत्मा तिर्यग् न भवति
आत्मा नारकः क्वापि नैव ज्ञानी जानाति योगी ।।९०।।
भावार्थ :ये सब गुरु, शिष्य, स्वामी, सेवकादि संबंध यद्यपि व्यवहारनयसे जीवके
स्वरूप हैं, तो भी शुद्धनिश्चयनयसे शुद्ध आत्मासे जुदे हैं, आत्माके नहीं हैं, त्यागने योग्य हैं,
इन भेदोंको वीतरागपरमानंद निज शुद्धात्माकी प्राप्तिसे रहित बहिरात्मा मिथ्यादृष्टिजीव अपने
समझता है, और इन्हीं भेदोंको वीतराग निर्विकल्पसमाधिमें रहता हुआ अंतरात्मा सम्यग्दृष्टिजीव
पर रूप (दूसरे) जानता है
।।८९।।
आगे आत्माका स्वरूप कहते हैं
गाथा९०
अन्वयार्थ :[आत्मा ] जीव पदार्थ [मनुष्यः देवः नापि ] न तो मनुष्य है, न तो
देव है, [आत्मा ] आत्मा [तिर्यग् न भवति ] तिर्यंच पशु भी नहीं है, [आत्मा ] आत्मा
[नारकः ] नारकी भी [क्वापि नैव ] कभी नहीं, अर्थात् किसी प्रकार भी पररूप नहीं है, परन्तु
[ज्ञानी ] ज्ञानस्वरूप है, उसको [योगी ] मुनिराज तीन गुप्तिके धारक और निर्विकल्पसमाधिमें
लीन हुए [जानाति ] जानते हैं
शुद्धनिश्चयनयथी परमात्मद्रव्यथी भिन्न अने हेयभूत छे, तेमने पोताना आत्मामां संबद्ध करे
छे अने तेमने ज वीतराग निर्विकल्प समाधिस्थ अन्तरात्मा परस्वरूप जाणे छे, ए भावार्थ
छे. ८९.
हवे (आत्मानुं स्वरूप कहे छे)ः