Parmatma Prakash (Gujarati Hindi) (Devanagari transliteration).

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अधिकार-१ः दोहा-९८ ]परमात्मप्रकाशः [ १६३
अप्पा णियमणि णिम्मलउ णियमें वसइ ण जासु आत्मा निजमनसि निर्मलो नियमेन
वसति तिष्ठति न यस्य सत्थपुराणइं तवचरणु मुक्खु वि करहिं किं तासु शास्त्रपुराणानि
तपश्चरणं च मोक्षमपि किं कुर्वन्ति तस्येति
तद्यथा वीतरागनिर्विकल्पसमाधिरूपा यस्य
शुद्धात्मभावना नास्ति तस्य शास्त्रपुराणतपश्चरणानि निरर्थकानि भवन्ति तर्हि किं सर्वथा
निष्फलानि नैवम् यदि वीतरागसम्यक्त्वरूपस्वशुद्धात्मोपादेयभावनासहितानि भवन्ति तदा
मोक्षस्यैव बहिरङ्गसहकारिकारणानि भवन्ति तदभावे पुण्यबन्धकारणानि भवन्ति
मिथ्यात्वरागादिसहितानि पापबन्धकारणानि च विद्यानुवादसंज्ञितदशमपूर्वश्रुतं पठित्वा
भर्गपुरुषादिवदिति भावार्थः
।।९८।।
अथात्मनि ज्ञाते सर्वं ज्ञातं भवतीति दर्शयति
शास्त्रके पुराण [तपश्चरणमपि ] तपस्या भी [किं ] क्या [मोक्षं ] मोक्षको [कुर्वंति ] कर सकते
हैं ? कभी नहीं कर सकते
भावार्थ :वीतरागनिर्विकल्पसमाधिरूप शुद्धभावना जिसके नहीं है, उसके शास्त्र,
पुराण, तपश्चरणादि सब व्यर्थ हैं यहाँ शिष्य प्रश्न करता है, कि क्या बिलकुल ही निरर्थक
हैं उसका समाधान ऐसा है, कि बिलकुल तो नहीं है, लेकिन वीतराग सम्यक्त्वरूप निज
शुद्धात्माकी भावना सहित हो, तब तो मोक्षके ही बाह्य सहकारीकारण है, यदि वे
वीतरागसम्यक्त्वके अभावरूप हों, तो पुण्यबंधके कारण हैं, और जो मिथ्यात्वरागादि सहित हों,
तो पापबंधके कारण है, जैसे कि रुद्र वगैरह विद्यानुवादनामा दशवें पूर्व तक शास्त्र पढ़कर भ्रष्ट
हो जाते हैं
।।९८।।
आगे जिन भव्यजीवोंने आत्माको जान लिया, उन्होंने सब जाना ऐसा दिखलाते हैं
भावार्थवीतराग निर्विकल्प समाधिरूप शुद्धात्मभावना जेने नथी तेने शास्त्र, पुराण
अने तपश्चरण निरर्थक छे.
प्रश्न :तो शुं तेओ सर्वथा (तद्दन) निष्फळ छे?
तेनुं समाधाान :सर्वथा नहि (तेओ सर्वथा निष्फळ नथी.) जो ‘वीतराग-सम्यक्त्वरूप
शुद्धात्मा ज उपादेय छे, एवी भावना सहित होय तो तेओ मोक्षनां बहिरंग सहकारी कारण
छे, तेना अभावमां तेओ पुण्यबंधनां कारण छे. मिथ्यात्व, रागादि सहित होय तो, तेओ
पापबंधनां कारण छे, जेम रुद्रपुरुषने विद्यानुवाद नामना दशमा पूर्व सुधी शास्त्र भणवा छतां
पापबंधनां कारण थयां हतां. ए भावार्थ छे. ९८.
हवे, आत्माने जाणतां सर्व जणायुं एम दर्शावे छेः