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योगीन्दुदेवविरचितः
[ अधिकार-१ः दोहा-९९
९९) जोइय अप्पेँ जाणिएण जगु जाणियउ हवेइ ।
अप्पहँ केरइ भावडइ बिंबिउ जेण वसेइ ।।९९।।
योगिन् आत्मना ज्ञातेन जगत् ज्ञातं भवति ।
आत्मनः संबन्धिनिर्भावे बिम्बितं येन वसति ।।९९।।
जोइय अप्पे जाणिएण हे योगिन् आत्मना ज्ञातेन । किं भवति । जगु जाणियउ हवेइ
जगत्त्रिभुवनं ज्ञातं भवति । कस्मात् । अप्पहं केरइ भावडइ बिंबिउ जेण बसेइ आत्मनः
संबन्धिनि भावे केवलज्ञानपर्याये बिम्बितं प्रतिबिम्बितं येन कारणेन वसति तिष्ठतीति ।
अयमर्थः । वीतरागनिर्विकल्पस्वसंवेदनज्ञानेन परमात्मतत्त्वे ज्ञाते सति समस्तद्वादशाङ्गागमस्वरूपं
ज्ञातं भवति । कस्मात् । यस्माद्राघवपाण्डवादयो महापुरुषा जिनदीक्षां गृहीत्वा द्वादशाङ्गं पठित्वा
गाथा – ९९
अन्वयार्थ : — [योगिन् ] हे योगी [आत्मना ज्ञातेन ] एक अपने आत्माके जाननेसे
[जगत् ज्ञातं भवति ] यह तीन लोक जाना जाता है, [येन ] क्योंकि [आत्मनः संबन्धिनि भावे ]
आत्माके भावरूप केवलज्ञानमें [बिम्बितं ] यह लोक प्रतिबिम्बित हुआ [वसति ] बस रहा हैं ।
भावार्थ : — वीतराग निर्विकल्पस्वसंवेदनज्ञानसे शुद्धात्मतत्त्वके जानने पर समस्त
द्वादशांग शास्त्र जाना जाता है । क्योंकि जैसे रामचन्द्र, पांडव, भरत, सगर आदि महान् पुरुष
भी जिनराजकी दीक्षा लेकर फि र द्वादशांगको पढ़कर द्वादशांग पढ़नेका फल निश्चयरत्नत्रय-
स्वरूप जो शुद्धपरमात्मा उसके ध्यानमें लीन हुए तिष्ठे थे । इसलिये वीतरागस्वसंवेदनज्ञानकर
अपने आत्माका जानना ही सार है, आत्माके जाननेसे सबका जानपना सफल होता है, इस
कारण जिन्होंने अपनी आत्मा जानी उन्होंने सबको जाना । अथवा निर्विकल्पसमाधिसे उत्पन्न
भावार्थः — वीतराग निर्विकल्प स्वसंवेदनरूप ज्ञान वडे परमात्मतत्त्व जाणतां, समस्त
बार अंगनुं स्वरूप जणायुं, कारण के (१) जेथी राम, पांडव आदि महापुरुषो जिनदीक्षा लईने
बार अंग भणीने बार अंगना अध्ययनना फळरूप, निश्चयरत्नत्रयात्मक परमात्मध्यानमां लीन
रहे छे तेथी वीतराग स्वसंवेदनरूप ज्ञान वडे निज आत्माने जाणतां सर्व जणायुं छे. (२) अथवा
निर्विकल्प समाधिथी उत्पन्न परमानंदरूप सुखरसनो आस्वाद उत्पन्न थतां ज, पुरुष एम जाणे
के ‘‘मारुं स्वरूप अन्य छे, देह-रागादि पर छे’’ तेथी आत्माने जाणतां, सर्व जणायुं. (३) अथवा
कर्तारूप आत्मा करणभूत श्रुतज्ञानरूप व्याप्तिज्ञानथी सर्व लोकालोकने जाणे छे तेथी आत्माने
जाणतां सर्व जणायुं. (४) अथवा केवळज्ञाननी उत्पत्तिना बीजरूप वीतराग, निर्विकल्प