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योगीन्दुदेवविरचितः
[ अधिकार-१ः दोहा-१०५
अप्पा णाणु मुणेहि तुहुं प्रभाकरभट्ट आत्मानं ज्ञानं मन्यस्व त्वम् । यः किं करोति ।
जो जाणइ अप्पाणु यः कर्ता जानाति । कम् । आत्मानम् । किंविशिष्टम् । जीवपएसहिं
तित्तिडउ जीवप्रदेशैस्तावन्मात्रं लोकमात्रप्रदेशम् । अथवा पाठान्तरम् । ‘जीवपएसहिं देहसमु’
तस्यार्थो निश्चयेन लोकमात्रप्रदेशोऽपि व्यवहारेणैव संहारविस्तारधर्मत्वाद्देहमात्रः । पुनरपि
कथंभूतम् आत्मानं णाणें गयणपवाणु ज्ञानेन कृत्वा व्यवहारेण गगनमात्रं जानीहीति । तद्यथा ।
निश्चयनयेन मतिश्रुतावधिमनःपर्ययकेवलज्ञानपञ्चकादभिन्नं व्यवहारेण ज्ञानापेक्षया
रूपावलोकनविषये द्रष्टिवल्लोकालोकव्यापकं निश्चयेन लोकमात्रासंख्येयप्रदेशमपि व्यवहारेण
स्वदेहमात्रं तमित्थंभूतमात्मानम् आहारभयमैथुनपरिग्रहसंज्ञास्वरूपप्रभृतिसमस्तविकल्पक ल्लोलजालं
[यः ] जो ज्ञानरूप आत्मा [आत्मानम् ] अपनेको [जीवप्रदेशैः तावन्मात्रं ] अपने प्रदेशोंसे
लोक-प्रमाण [ज्ञानेन गगनप्रमाणम् ] ज्ञानसे व्यवहारनयकर आकाश-प्रमाण [जानाति ] जानता
है ।
भावार्थ : — निश्चयनयकर मति श्रुत अवधि मनःपर्यय केवल इन पाँच ज्ञानोंसे अभिन्न
तथा व्यवहारनयसे ज्ञानकी अपेक्षारूप देखनेमें नेत्रोंकी तरह लोक-अलोकमें व्यापक है । अर्थात्
जैसे आँख रूपी पदार्थोंको देखती हैं, परंतु उन स्वरूप नहीं होती, वैसे ही आत्मा यद्यपि लोक-
अलोकको जानता है, देखता है, तो भी उन स्वरूप नहीं होता, अपने स्वरूप ही रहता है,
ज्ञानकर ज्ञेय प्रमाण है, यद्यपि निश्चयसे प्रदेशोंकर लोक-प्रमाण है, असंख्यात प्रदेशी है, तो भी
व्यवहारनयकर अपने देह-प्रमाण है, ऐसे आत्माको जो पुरुष आहार, भय, मैथुन परिग्रहरूप
चार वांछाओं स्वरूप आदि समस्त विकल्पकी तरंगोंको छोड़कर जानता है, वही पुरुष ज्ञानसे
अभिन्न होनेसे ज्ञान कहा जाता है । आत्मा और ज्ञानमें भेद नहीं है, आत्मा ही ज्ञान है । यहाँ
सारांश यह है, कि निश्चयनयकरके पाँच प्रकारके ज्ञानोंसे अभिन्न अपने आत्माको जो ध्यानी
भावार्थः — निश्चयनयथी (आत्मा) मतिज्ञान, श्रुतज्ञान, अवधिज्ञान, मनःपर्ययज्ञान,
केवळज्ञान ए पांच ज्ञानथी अभिन्न छे. जेवी रीते आंख रूप देखवाना विषयमां एक प्रकारे
(व्यवहारनयथी) व्यापक कहेवाय छे तेवी रीते, व्यवहारनयथी ज्ञाननी अपेक्षाए लोकालोक व्यापक
छे, निश्चयथी लोक जेटलो असंख्यात प्रदेशी छे, व्यवहारथी स्वदेहप्रमाण छे – आवा आत्माने
आहार-भय-मैथुन-परिग्रहसंज्ञास्वरूपथी मांडीने समस्त विकल्पजाळनो त्याग करीने जे जाणे छे
ते पुरुष ज ज्ञानथी अभिन्न होवाथी ज्ञान कहेवाय छे.
अहीं, निश्चयनयथी आ ज पांच ज्ञानथी अभिन्न आत्माने जे ध्याता जाणे छे तेने
ज उपादेय जाणो, एवो भावार्थ छे. (श्री समयसार गाथा २०४मां) कह्युं पण छे के