Parmatma Prakash (Gujarati Hindi) (Devanagari transliteration). Gatha: 106 (Adhikar 1).

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अधिकार-१ः दोहा-१०६ ]परमात्मप्रकाशः [ १७३
त्यक्त्वा जानाति यः स पुरुष ज्ञानादभिन्नत्वाज् ज्ञानं भण्यत इति अत्रायमेव निश्चयनयेन
पञ्चज्ञानादभिन्नमात्मानं जानात्यसौ ध्याता तमेवोपादेयं जानीहीति भावार्थः तथा चोक्त म्
‘‘आभिणिबोहिय सुदोधिमणकेवल च तं होदि एगमेव पदं सो एसो परमट्ठो जं लहिदुं
णिव्वुदिं गादि ।।’’ ।।१०५।।
१०६) अप्पहँ जे वि विभिण्ण वढ ते वि हवंति ण णाणु
ते तुहुँ तिण्णि वि परिहरिवि णियमिँ अप्पु वियाणु ।।१०६।।
आत्मनः ये अपि विभिन्नाः वत्स तेऽपि भवन्ति न ज्ञानम्
तान् त्वं त्रीण्यपि परिहृत्य नियमेन आत्मानं विजानीहि ।।१०६।।
अप्पहँ जे वि विभिण्ण वढ आत्मनः सकाशाद्येऽपि भिन्नाः वत्स ते वि हवंति
जानता है, उसी आत्माको तू उपादेय जान ऐसा ही सिद्धांतोंमें हरएक जगह कहा है
‘‘आभिणि’’ इत्यादि इसका अर्थ यह है, कि मति श्रुत अवधि मनःपर्यय केवलज्ञान ये पाँच
प्रकारके सम्यग्ज्ञान एक आत्माके ही स्वरूप हैं, आत्माके बिना ये ज्ञान नहीं हो सकते, वह
आत्मा ही परम अर्थ है, जिसको पाकर वह जीव निर्वाणको पाता है
।।१०५।।
आगे परभावका निषेध करते हैं
गाथा१०६
अन्वयार्थ :[वत्स ] हे शिष्य, [आत्मनः ] आत्मा से [ये अपि भिन्नाः ] जो जुदे
भाव हैं, [तेऽपि ] वे भी [ज्ञानम् न भवंति ] ज्ञान नहीं हैं, वे सब भाव ज्ञानसे रहित जड़रूप
हैं, [तान् ] उन [त्रीणि अपि ] धर्म, अर्थ, कामरूप तीनों भावोंको [परिहृत्य ] छोड़कर
[नियमेन ] निश्चयसे [आत्मानं ] आत्माको [त्वं ] तू [विजानीहि ] जान
भावार्थ :हे प्रभाकर भट्ट, मुनिरूप धर्म, अर्थरूप संसार के प्रयोजन, काम
‘‘आभिणिबोहिय सुदोधिमणकेवलं च तं होदि एक्कमेव पदं सो एसो परमट्ठो जं लहिदुं णिव्वुदिं जादि ।।
अर्थमतिज्ञान, श्रुतज्ञान, अवधिज्ञान, मनःपर्ययज्ञान अने केवळज्ञानते एक ज पद छे
[कारण के ज्ञानना सर्व भेदो ज्ञान ज छे; ते आ परमार्थ छे (शुद्धनयना विषयभूत
ज्ञानसामान्य ज आ परमार्थ छे-) के जेने पामीने आत्मा निर्वाणने प्राप्त थाय छे.] १०५.
हवे परभावनो निषेध करे छे.
भावार्थनिश्चयनयथी सकळ-विशद-एक-ज्ञानस्वरूप परमार्थ-पदार्थथी भिन्न एवा