Parmatma Prakash (Gujarati Hindi) (Devanagari transliteration). Gatha: 109 (Adhikar 1).

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अधिकार-१ः दोहा-१०९ ]परमात्मप्रकाशः [ १७७
कथंभूतो निजात्मा णाणिउ ज्ञानी ज्ञानलक्षणः तमित्थंभूतमात्मानं जा ण मुणेहि यावत्कालं
न जानासि ता अण्णाणिं णाणमउं तावत्कालमज्ञानेन मिथ्यात्वरागादिविकल्पजालेन ज्ञानमयम्
किं पर बंभु लहेहि किं परमुत्कृष्टं ब्रह्मस्वभावं लभसे किं तु नैवेति तद्यथा यावत्कालमात्मा
कर्ता आत्मानं कर्मतापन्नम् आत्मना करणभूतेन आत्मने निमित्तं आत्मनः सकाशात् आत्मनि
स्थितं समस्तरागादिविकल्पजालं मुक्त्वा न जानासि तावत्कालं परमब्रह्मशब्दवाच्यं
निर्दोषिपरमात्मानं किं लभसे नैवेति भावार्थः
।।१०८।। इति सूत्रचतुष्टयेनान्तरस्थले
ज्ञानव्याख्यानं गतम्
अथानन्तरं सूत्रचतुष्टयेनान्तरस्थले परलोकशब्दव्युत्पत्त्या परलोकशब्दवाच्यं परमात्मानं
कथयति
१०९) जोइज्जइ तिं बंभु परु जाणिज्जइ तिं सोइ
बंभु मुणेविणु जेण लहु गम्मिज्जइ परलोइ ।।१०९।।
द्रश्यते तेन ब्रह्मा परः ज्ञायते तेन स एव
ब्रह्म मत्वा येन लघु गम्यते परलोके ।।१०९।।
तिष्ठता नहीं जान ले, तब तक निर्दोष शुद्ध परमात्मा सिद्धपरमेष्ठीको क्या पा सकता है ? कभी
नहीं पा सकता
जो आत्माको जानता है, वही परमात्माको जानता है ।।१०८।।
इसप्रकार प्रथम महास्थलमें चार दोहोंमें अंतरस्थलमें ज्ञानका व्याख्यान किया आगे
चार सूत्रोंमें अंतरस्थलमें परलोक शब्दकी व्युत्पत्तिकर परलोक शब्दसे परमात्माको ही कहते
हैं
गाथा१०९
अन्वयार्थ :[तेन ] उस कारणसे उसी पुरुषसे [परः ब्रह्मा ] शुद्धात्मा नियमसे
आत्माने माटे, आत्माथी, आत्मामां स्थित थईने समस्त रागादि विकल्पजाळने छोडीने
जाणतो नथी; त्यां सुधी ‘परब्रह्म’ शब्दथी वाच्य एवा निर्दोष परमात्माने शुं पामी शके?
न पामी शके, ए भावार्थ छे. १०८.
ए रीते प्रथम महास्थळमां चार दोहक सूत्रोथी अन्तरस्थळमां ज्ञाननुं व्याख्यान समाप्त
थयुं.
त्यार पछी अन्तरस्थळमां चार गाथा सूत्रोथी परलोक शब्दनी व्युत्पत्ति अनुसार परलोक
शब्दथी वाच्य परमात्मानुं कथन करे छेः