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योगीन्दुदेवविरचितः
[ अधिकार-१ः दोहा-१०९
जोइज्जइ द्रश्यते तिं तेन पुरुषेण तेन कारणेन वा । कोऽसौ द्रश्यते । बंभु परु
ब्रह्मशब्दवाच्यः शुद्धात्मा । कथंभूतः । परः उत्कृष्टः । अथवा पर इति पाठे नियमेन । न केवलं
द्रश्यते जाणिज्जइ ज्ञायते तेन पुरुषेण तेन कारणेन वा सोइ स एव शुद्धात्मा । केन कारणेन ।
बंभु मुणेविणु जेण लहु येन पुरुषेण येन कारणेन वा ब्रह्मशब्दवाच्यनिर्दोषिपरमात्मानं मत्वा
ज्ञात्वा पश्चात् गम्मिज्जइ परलोइ तेनैव पूर्वोक्ते न ब्रह्मस्वरूपपरिज्ञानपुरुषेण तेनैव कारणेन वा
गम्यते । क्व । परलोके परलोकशब्दवाच्ये परमात्मतत्त्वे । किं च । योऽसौ शुद्धनिश्चयनयेन
शक्ति रूपेण केवलज्ञानदर्शनस्वभावः परमात्मा स सर्वेषां सूक्ष्मैकेन्द्रियादिजीवानां शरीरे पृथक्
पृथग्रूपेण तिष्ठति स एव परमब्रह्मा स एव परमविष्णुः स एव परमशिवः इति, व्यक्ति रूपेण
पुनर्भगवानर्हन्नैव मुक्ति गतसिद्धात्मा वा परमब्रह्मा विष्णुः शिवो वा भण्यते । तेन नान्यः कोऽपि
परिकल्पितः जगद्वयापी तथैवैको परमब्रह्मा विष्णुः शिवो वास्तीति । अयमत्रार्थः । यत्रासौ
[दृश्यते ] देखा जाता है, [तेन ] उसी पुरुषसे निश्चयसे [स एव ] वही शुद्धात्मा [ज्ञायते ]
जाना जाता है, [येन ] जो पुरुष जिस कारण [ब्रह्म मत्वा ] अपना स्वरूप जानकर [परलोके
लघु गम्यते ] परमात्मतत्त्वमें शीघ्र ही प्राप्त होता है ।
भावार्थ : — जो कोई शुद्धात्मा अपना स्वरूप शुद्ध निश्चयनयकर शक्तिरूपसे
केवलज्ञान केवलदर्शन स्वभाव है, वही वास्तवमें (असलमें) परमेश्वर है । परमेश्वरमें और
जीवमें जाति-भेद नहीं है, जब तक कर्मोंसे बँधा हुआ है, तब तक संसारमें भ्रमण करता है ।
सूक्ष्म बादर एकेन्द्रियादि जीवोंके शरीरमें जुदा जुदा तिष्ठता है, और जब कर्मोंसे रहित हो जाता
है, तब सिद्ध कहलाता है । संसार-अवस्थामें शक्तिरूप परमात्मा है, और सिद्ध-अवस्थामें
व्यक्तिरूप है । यही आत्मा परब्रह्म, परमविष्णु शक्तिरूप है, और प्रगटरूपसे भगवान् अर्हंत
अथवा मुक्तिको प्राप्त हुए सिद्धात्मा ही परमब्रह्मा, परमविष्णु, परमशिव कहे जाते हैं । यह
निश्चयसे जानो । ऐसा कहनेसे अन्य कोई भी कल्पना किया हुआ जगत्में व्यापक परमब्रह्म,
परमविष्णु, परमशिव नहीं । सारांश यह है कि जिस लोकके शिखर पर अनंत सिद्ध विराज
रहे हैं, वही लोकका शिखर परमधाम ब्रह्मलोक वहीं विष्णुलोक और वही शिवलोक है, अन्य
भावार्थः — शुद्धनिश्चयनयथी शक्तिरूपे केवळज्ञानदर्शनस्वभाववाळा जे परमात्मा छे ते,
सर्व सूक्ष्म एकेन्द्रियादि जीवोना शरीरमां पृथक् पृथक्रूपे रहे छे, ते ज परमब्रह्मा छे ते ज
परम विष्णु छे अने ते ज परमशिव छे, अने व्यक्तिरूपे भगवान अर्हंत ज अथवा मुक्तिगत
सिद्धात्मा ज परमब्रह्मा छे, विष्णु छे, शिव छे, तेनाथी बीजो कोई कल्पित जगद्व्यापी तेम
ज एक परब्रह्म, विष्णु, शिव नथी.