भवतनुभोगेषु रञ्जितं मूर्छितं वासितमासक्तं चित्तं स्वसंवित्तिसमुत्पन्नवीतराग-
परमानन्दसुखरसास्वादेन व्यावृत्त्य स्वशुद्धात्मसुखे रतत्वात्संसारशरीरभोगविरक्तमनाः सन् यः
शुद्धात्मानं ध्यायति तस्य गुरुक्की महती संसारवल्ली त्रुटयति नश्यति शतचूर्णा भवतीति । अत्र
येन परमात्मध्यानेन संसारवल्ली विनश्यति स एव परमात्मोपादेयो भावनीयश्चेति
तात्पर्यार्थः ।।३२।। इति चतुर्विंशतिसूत्रमध्ये प्रक्षेपकपञ्चकं गतम् ।
तदनन्तरं देहदेवगृहे योऽसौ वसति स एव शुद्धनिश्चयेन परमात्मा तन्निरूपयति –
३३) देहादेवलि जो वसइ देउ अणाइ-अणंतु ।
केवल-णाण-फु रंत-तणु सो परमप्पु णिभंतु ।।३३।।
विरक्त मन हुआ [आत्मानं ] शुद्धात्माका [ध्यायति ] चिंतवन करता है, [तस्य ] उसकी
[गुर्वी ] मोटी [सांसारिकी वल्ली ] संसाररूपी बेल [त्रुटयति ] नाशको प्राप्त हो जाती है ।
भावार्थ : — संसार, शरीर, भोगोंमें अत्यंत आसक्त (लगा हुआ) चित्त है, उसको
आत्मज्ञानसे उत्पन्न हुए वीतराग परमानंद सुखामृतके आस्वादसे राग-द्वेषसे हटाकर अपने
शुद्धात्म-सुखमें अनुरागी कर शरीरादिकमें वैराग्यरूप हुआ जो शुद्धात्माको विचारता है, उसका
संसार छूट जाता है, इसलिये जिस परमात्माके ध्यानसे संसाररूपी बेल दूर हो जाती है, वही
ध्यान करने योग्य (उपादेय) है ।।३२।।
आगे जो देहरूपी देवालयमें रहता है, वही शुद्धनिश्चयनयसे परमात्मा है, यह कहते
हैं —
भावार्थः — संसार, शरीर अने भोगोमां रंजित-मूर्च्छित-वासित-आसक्त चित्तने
स्वसंवित्तिथी उत्पन्न वीतराग परमानंदरूप सुखना रसास्वाद वडे (संसार, शरीर अने भोगोथी)
व्यावृत्त करीने (पाछुं वाळीने) निज शुद्धात्मसुखमां रत थवाथी संसार, शरीर अने भोगोथी
विरक्त मनवाळो थयो थको जे शुद्ध आत्माने ध्यावे छे तेनी संसाररूपी मोटी वेलना सेंकडो कटका
थई जाय छे – चूरेचूरा थई जाय छे – नाश पामी जाय छे.
अहीं जे परमात्माना ध्यानथी संसारवल्ली नाश पामे छे ते ज परमात्मा उपादेय छे,
अने भाववा योग्य छे एवो तात्पर्यार्थ छे. ३२.
ए प्रमाणे चोवीश सूत्रोमां पांच प्रक्षेपक सूत्रो समाप्त थयां.
त्यार पछी, देहरूपी देवालयमां जे रहे छे ते ज शुद्धनिश्चयनयथी परमात्मा छे एम
कहे छेः —
६२ ]
योगीन्दुदेवविरचितः
[ अधिकार-१ः दोहा-३३