गृहीत्वाप्यत्रैव भवे विशिष्टसमाधिबलेन पुण्यबन्धं कृत्वा पश्चात्पूर्वकृतचारित्रमोहोदयेन विषयासक्तो
भूत्वा रुद्रो भवति । कथं ते परमात्मस्वरूपं न जानन्ति इति पूर्वपक्षः । तत्र परिहारं ददाति ।
युक्त मुक्तं भवता, यद्यपि रत्नत्रयाराधनां कृतवन्तस्तथापि याद्रशेन
वीतरागनिर्विकल्परत्नत्रयस्वरूपेण तद्भवे मोक्षो भवति ताद्रशं न जानन्तीति । अत्र यमेव
शुद्धात्मानं साक्षादुपादेयभूतं तद्भवमोक्षसाधकाराधनासमर्थं च ते हरिहरादयो न जानन्तीति य
एवोपादेयो भवतीति भावार्थः ।।४२।।
बलसे पुण्यबंध करता है, उसके बाद पूर्वकृत चारित्रमोहके उदयसे विषयोंमें लीन हुआ रुद्र
(हर) कहलाता है । इसलिये वे हरिहरादिक परमात्माका स्वरूप कैसे नहीं जानते ? इसका
समाधान यह है, कि तुम्हारा कहना ठीक है । यद्यपि इन हरिहरादिक महान पुरुषोंने रत्नत्रयकी
आराधना की, तो भी जिस तरहके वीतराग-निर्विकल्प-रत्नत्रयस्वरूपसे तद्भव मोक्ष होता है,
वैसा रत्नत्रय इनके नहीं प्रगट हुआ, सरागरत्नत्रय हुआ है, इसीका नाम व्यवहाररत्नत्रय है ।
सो यह तो हुआ, लेकिन शुद्धोपयोगरूप वीतरागरत्नत्रय नहीं हुआ, इसलिये वीतरागरत्नत्रयके
धारक उसी भवसे मोक्ष जानेवाले योगी जैसा जानते हैं, वैसा ये हरिहरादिक नहीं जानते ।
इसीलिये परमशुद्धोपयोगियोंकी अपेक्षा इनको नहीं जाननेवाले कहा गया है, क्योंकि जैसे
स्वरूपके जाननेसे साक्षात् मोक्ष होता है, वैसा स्वरूप ये नहीं जानते । यहाँपर सारांश यह
है, कि जिस साक्षात् उपादेय शुद्धात्माको तद्भव मोक्षके साधक महामुनि ही आराध सकते
हैं, और हरिहरादिक नहीं जान सकते, वही चिंतवन करने योग्य है ।।४२।।
पूर्वपक्षः — पूर्वभवमां कोई जीव भेदाभेदरत्नत्रयनी आराधना करीने, अने विशिष्ट
पुण्यबंध करीने पछी अज्ञानभावथी निदानबंध करे छे, त्यार पछी ते स्वर्गमां जईने फरी मनुष्य
थईने त्रण खंडनो अधिपति एवो वासुदेव थाय छे; बीजो कोई जीव जिनदीक्षा ग्रहीने पण
ते ज भवमां विशिष्ट समाधिना बळथी पुण्यबंध करीने, पछी पूर्वकृत चारित्रमोहना उदयथी
विषयासक्त थईने रुद्र थाय छे; तो पछी तेओ परमात्मस्वरूपने नथी जाणता — एम केम कहो
छो?
तेनुं समाधानः — तमारुं कहेवुं योग्य छे. जो के ते हरि, हर जेवा प्रसिद्ध पुरुषोए
पूर्वे रत्नत्रयनी आराधना करेली छे तोपण, जेवा वीतराग निर्विकल्प रत्नत्रयस्वरूपथी ते ज भवे
मोक्ष थाय तेवा प्रकारे तेओ परमात्मस्वरूपने जाणता नथी.
अहीं साक्षात् उपादेयभूत अने ते ज भवे मोक्षनी साधक एवी आराधनामां
समर्थ, एवा जे शुद्ध आत्माने ते हरि-हरादि जाणता नथी, ते ज उपादेय छे एवो भावार्थ
छे. ४२.
अधिकार-१ः दोहा-४२ ]परमात्मप्रकाशः [ ७५