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yogIndudevavirachita
[ adhikAr-1 dohA-98
येन कारणेन परमात्मध्यानेनान्तर्मुहूर्तेन मोक्षो लभ्यते तेन कारणेन संसारस्थिति-
च्छेदनार्थमिदानीमपि तदेव ध्यातव्यमिति भावार्थः ।।९७।।
अथ अस्य वीतरागमनसि शुद्धात्मभावना नास्ति तस्य शास्त्रपुराणतपश्चरणानि किं
कुर्वन्तीति कथयति —
९८) अप्पा णिय – मणि णिम्मलउ णियमेँ वसइ ण जासु ।
सत्थ – पुराणइँ तव – चरणु मुक्खु वि करहिँ कि तासु ।।९८।।
आत्मा निजमनसि निर्मलः नियमेन वसति न यस्य ।
शास्त्रपुराणानि तपश्चरणं मोक्षं अपि कुर्वन्ति किं तस्य ।।९८।।
तक गुणस्थान है, ऊ परके गुणस्थान नहीं हैं । इस जगह तात्पर्य यह हैं कि जिस कारण
परमात्माके ध्यानसे अंतर्मुहूर्तमें मोक्ष होता है, इसलिये संसारकी स्थिति घटानेके वास्ते अब
भी धर्मध्यानका आराधन करना चाहिये, जिससे परम्परया मोक्ष भी मिल सकता है ।।९७।।
आगे ऐसा कहते हैं कि, जिसके राग रहित मनमें शुद्धात्माकी भावना नहीं है, उनके
शास्त्र, पुराण, तपश्चरण क्या कर सकते हैं ? अर्थात् कुछ भी नहीं कर सकते —
गाथा – ९८
अन्वयार्थ : — [यस्य ] जिसके [निजमनसि ] निज मनमें [निर्मलः आत्मा ] निर्मल
आत्मा [नियमेन ] निश्चयसे [न वसति ] नहीं रहता, [तस्य ] उस जीवके [शास्त्रपुराणानि ]
shukladhyAnano niShedh karyo chhe paN temaNe A kALamAn dharmadhyAn kahyun chhe, (dharmadhyAn hoy em
kahyun chhe.) upasham ane kShapakashreNIthI nIchenA guNasthAnamAn vartatA jIvone dharmadhyAn hoI shake
chhe tevI bhagavAnanI AgnA chhe.
ahIn, je kAraNe paramAtmAnA dhyAnathI antarmuhUrtamAn mokSha maLe chhe te kAraNe sansAranI
sthiti chhedavA mATe atyAre paN (A panchamakALamAn paN) te ja paramAtmAnun dhyAn karavA yogya
chhe, evo bhAvArtha chhe. 97✽.
have, kahe chhe ke jenA rAgarahit manamAn shuddhAtmabhAvanA nathI tene shAstra, purAN,
tapashcharaNAdi shun kare? te kahe chhe.
✽A gAthA sanskRit TIkAvALI bhagavatI ArAdhanA AshvAs 7, gAthA 2028 pAnA
1772nI sanskRit TIkAmAn AdhArarUpe Apel chhe.