Parmatma Prakash (Gujarati Hindi) (English transliteration). Gatha: 123*3 (Adhikar 1).

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adhikAr-2 dohA-1233 ]paramAtmaprakAsha [ 199
जातः बीहि वि समरसिहूवाहं एवं द्वयोरपि समरसीभूतयोः पुज्ज पूजां चडावउं समारोपयामि
कस्स कस्य निश्चयनयेन न कस्यापीति अयमत्र भावार्थः यद्यपि व्यवहारनयेन गृहस्थावस्थायां
विषयकषायदुर्ध्यानवञ्चनार्थं धर्मवर्धनार्थं च पूजाभिषेकदानादिव्यवहारोऽस्ति तथापि वीतराग-
निर्विकल्पसमाधिरतानां तत्काले बहिरङ्गव्यापाराभावात् स्वयमेव नास्तीति
।।१२३“२।।
१२३-३) जेण णिरंजणि मणु धरिउ विषय-कसायहिँ जंतु
मोक्खहँ कारणु एत्तडउ अण्णु ण तनु ण मंतु ।।१२३“३।।
येन निरञ्जने मनः धृतं विषयकषायेषु गच्छत्
मोक्षस्य कारणं एतावदेव अन्यः न तन्त्रं न मन्त्रः ।।१२३“३।।
जेण इत्यादि येन येन पुरुषेण कर्तृभूतेन णिरंजणि कर्माञ्जनरहिते परमात्मनि मण
मनः धरिउ धृतम् किं कुर्वत् सत् विसयकसायहिं जंतु विषयकषायेषु गच्छत् सत्
अवस्थामें विषय कषायरूप खोटे ध्यानको हटानेके लिये और धर्मको बढ़ानेके लिये पूजा,
अभिषेक, दान आदिका व्यवहार है, तो भी वीतरागनिर्विकल्पसमाधिमें लीन हुए योगीश्वरोंको
उस समयमें बाह्य व्यापारका अभाव होनेसे स्वयं ही द्रव्य-पूजाका प्रसंग नहीं आता, भाव-
पूजामें ही तन्मय हैं
।।१२३।।
आगे इसी कथनको दृढ़ करते हैं
गाथा१२३
अन्वयार्थ :[येन ] जिस पुरुषने [विषयकषायेषु गच्छत् ] विषय कषायोंमें जाता
हुआ [मनः ] मन [निरंजने धृतं ] कर्मरूपी अंजनसे रहित भगवान्में रक्खा [एतावदेव ] और
ये ही [मोक्षस्य कारणं ] मोक्षके कारण हैं, [अन्यः ] दूसरा कोई भी [तन्त्रं न ] तंत्र नहीं हैं,
[मन्त्रः न ] और न मंत्र है
तंत्र नाम शास्त्र व औषधका है, मंत्र नाम मंत्राक्षरोंका है विषय
कषायादि पर पदार्थोंसे मनको रोककर परमात्मामें मनको लगाना, यही मोक्षका कारण है
भावार्थ :जो कोई निकट-संसारी जीव शुद्धात्मतत्त्वकी भावनासे उलटे विषय
samAdhimAn rat yogIshvarone te kALe bahirang vyApArano abhAv hovAthI svayam ja hotAn
nathI. 123*2.
have, A kathanane draDh kare chhe
‘‘विसयकसायहिं जंतु’’‘‘viShayakaShAy’’ shabdane trIjI vibhaktino pratyay hovA chhatAn tame