Parmatma Prakash (Gujarati Hindi) (English transliteration).

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yogIndudevavirachita
[ adhikAr-2 dohA-50
विषयाणां उपरि परममुनिः द्वेषमपि करोति न रागम्
विषयेभ्यः येन विज्ञातः भिन्नः आत्मस्वभावः ।।५०।।
विसयहं इत्यादि विसयहं उप्परि विषयाणामुपरि परम-मुणि परममुनिः देसु वि करइ
ण राउ द्वेषमपि नापि करोति न च रागमपि येन किं कृतम् विसयहं जेण वियाणियउ
विषयेभ्यो येन विज्ञातः कोऽसौ विज्ञातः भिण्णउ अप्प-सहाउ आत्मस्वभावः कथंभूतो भिन्न
इति तथा च द्रव्येन्द्रियाणि भावेन्द्रियाणि द्रव्येन्द्रियभावेन्द्रियग्राह्यान् विषयांश्च द्रष्ट-
श्रुतानुभूतान् जगत्त्रये कालत्रयेऽपि मनोवचनकायैः कृतकारितानुमतैश्च त्यक्त्वा निजशुद्धात्म-
भावनासमुत्पन्नवीतरागपरमानन्दैकरूपसुखामृतरसास्वादेन तृप्तो भूत्वा यो विषयेभ्यो भिन्नं
शुद्धात्मानमनुभवति स मुनिपञ्चेन्द्रियविषयेषु रागद्वेषौ न करोति
अत्र यः
पञ्चेन्द्रियविषयसुखान्निवर्त्य स्वशुद्धात्मसुखे तृप्तो भवति तस्यैवेदं व्याख्यानं शोभते न च
bhAvArthadravyendriy ane bhAvendriyane ane dravyendriy tathA bhAvendriyathI grAhya evA
dekhelA, sAmbhaLelA, anubhavelA viShayone traN lok ane traN kALamAn man-vachan-kAyAthI kRut,
kArit, anumodanathI chhoDIne nijashuddhAtmAnI bhAvanAthI utpanna vItarAg paramAnand jenun ek rUp
chhe evA sukhAmRutanA rasAsvAdathI tRupta thaIne je viShayothI bhinna shuddha AtmAne anubhave chhe
te muni pAnch indriyonA viShayamAn rAg-dveSh karato nathI.
ahIn, je pAnch indriyanA viShayasukhane nivartIne svashuddha AtmasukhamAn tRupta rahe chhe tene
गाथा५०
अन्वयार्थ :[परममुनिः ] महामुनि [विषयाणां उपरि ] पाँच इन्द्रियोंके स्पर्शादि
विषयों पर [रागमपि द्वेषं ] राग और द्वेष [न करोति ] नहीं करता, अर्थात् मनोज्ञ विषयों पर
राग नहीं करता और अनिष्ट विषयों पर द्वेष नहीं करता; क्योंकि [येन ] जिनसे [आत्मस्वभावः ]
अपना स्वभाव [विषयेभ्यः ] विषयोंसे [भिन्नः विज्ञातः ] जुदा समझ लिया है
इसलिये
वीतराग दशा धारण कर ली है
भावार्थ :द्रव्येन्द्री, भावेन्द्री और इन दोनोंसे ग्रहण करने योग्य देखे सुने
अनुभव किये जो रूपादि विषय हैं, उनको मन, वचन, काय, कृत, कारित अनुमोदनासे
छोड़कर और निज शुद्धात्माकी भावनासे उत्पन्न वीतराग परमानंदरूप अतींद्रियसुखके रसके
आस्वादनेसे तृप्त होकर विषयोंसे भिन्न अपने आत्माको जो मुनि अनुभवता है, वो ही
विषयोंमें राग-द्वेष नहीं करता
यहाँ पर तात्पर्य यह है, कि जो पंचेन्द्रियोंके विषयसुखसे
निवृत्त होकर निज शुद्ध आत्मसुखमें तृप्त होता है, उसीको यह व्याख्यान शोभा देता