विषयासक्त स्येति भावार्थः ।।५०।।
अथ —
१७८) देहहँ उप्परि परम-मुणि देसु वि करइ ण राउ ।
देहहँ जेण वियाणियउ भिण्णउ अप्प-सहाउ ।।५१।।
देहस्य उपरि परममुनिः द्वेषमपि करोति न रागम् ।
देहाद् येन विज्ञातः भिन्नः आत्मस्वभावः ।।५१।।
देहहं इत्यादि । देहहं उप्परि देहस्योपरि परम-मुणि परममुनिः देसु वि करइ ण राउ
द्वेषमपि न करोति न रागमपि । येन किं कृतम् । देहहं जेण वियाणियउ देहात्सकाशाद्येन
विज्ञातः । कोऽसौ । भिण्णउ अप्प-सहाउ आत्मस्वभावः । कथंभूतो विज्ञातः । तस्माद्देहाद्भिन्न
इति । तथाहि — ‘‘सपरं बाधासहिदं विच्छिण्णं बंधकारणं विसमं । जं इंदिएहिं लद्धं तं सुक्खं
ja A vyAkhyAn shobhe chhe paN jeo viShayamAn Asakta chhe temane A kathan shobhatun nathI, evo
bhAvArtha chhe. 50.
vaLI (have, param muni deh upar paN rAg-dveSh karato nathI, em kahe chhe.) —
bhAvArtha — kahyun paN chhe ke – सपरं बाधासहिदं विच्छिण्णं विसमं । ज इंदिएहिं लद्धं तं सुक्खं
दुक्खमेव तहा ।। (shrI pravachanasAr 76) artha — je indriyothI prApta thAy chhe, te sukh paranA
sambandhavALun, bAdhAsahit, vichchhinna, bandhanun kAraN ane viSham chhe; (e rIte te dukh ja chhe.)
adhikAr-2 dohA-51 ]paramAtmaprakAsha [ 301
है, और विषयाभिलाषीको नहीं शोभता ।।५०।।
आगे साधु देहके ऊ पर भी राग-द्वेष नहीं करता —
गाथा – ५१
अन्वयार्थ : — [परममुनिः ] महामुनि [देहस्य उपरि ] मनुष्यादि शरीरके ऊ पर भी
[रागमपि द्वेषम् ] राग और द्वेषको [न करोति ] नहीं करता अर्थात् शुभ शरीरसे राग नहीं
करता, अशुभ शरीरसे द्वेष नहीं करता, [येन ] जिसने [आत्मस्वभावः ] निजस्वभाव [देहात् ]
देहसे [भिन्नः विज्ञातः ] भिन्न जान लिया है । देह तो जड़ है, आत्मा चैतन्य है, जड़ चैतन्यका
क्या संबंध ?
भावार्थ : — इन इंद्रियोंसे जो सुख उत्पन्न हुआ है, वह दुःखरूप ही है । ऐसा कथन
श्रीप्रवचनसारमें कहा है । ‘सपरम’ इत्यादि । इसका तात्पर्य ऐसा है, कि जो इन्द्रियोंसे सुख प्राप्त