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yogIndudevavirachita
[ adhikAr-2 dohA-150
bhAvArtha — traN lokamAn jeTalAn dukho chhe teTalAn dukhothI banel hovAthI A deh
dukharUp chhe ane paramAtmA to vyavahArathI dehamAn rahelo hovA chhatAn paN nishchayathI dehathI
bhinna hovAthI anAkuLatA jenun lakShaN chhe evA sukhasvabhAvavALo chhe. traN lokamAn jeTalAn
pApo chhe teTalAn pApothI banel hovAthI A deh pAparUp chhe, ane shuddha AtmA to
vyavahArathI dehamAn rahevA chhatAn paN nishchayathI pAparUp dehathI bhinna hovAthI atyant pavitra
chhe. traN lokamAn jeTalA ashuchi padArtho chhe teTalA ashuchi padArthothI banel hovAthI A deh
ashuchirUp chhe ane shuddha AtmA to vyavahArathI dehamAn rahelo hovA chhatAn paN nishchayathI
dehathI pRuthakbhUt (alag, bhinna, judo) hovAthI atyant nirmaL chhe.
ahIn, e pramANe dehanI sAthe shuddha AtmAno bhed jANIne nirantar (Atma) bhAvanA
karavI joIe, evun tAtparya chhe. 150.
दुक्खइं इत्यादि । दुक्खइं दुःखानि पावइं पापानि असुचियइं अशुचिद्रव्याणि
ति-हुयणि सयलइं लेवि भुवनत्रयमध्ये समस्तानि गृहीत्वा एयहिं देहु विणिम्मियउ एतैर्देहो
विनिर्मितः । केन कर्तृभूतेन । विहिणा विधिशब्दवाच्येन कर्मणा । कस्मादेवंभूतो देहः कृतः
वइरु मुणेवि वैरं मत्वेति । तथाहि । त्रिभुवनस्थदुःखैर्निर्मितत्वात् दुःखरूपोऽयं देहः,
परमात्मा तु व्यवहारेण देहस्थोऽपि निश्चयेन देहाद्भिन्नत्वादनाकुलत्वलक्षणसुखस्वभावः ।
त्रिभुवनस्थपापैर्निर्मितत्वात् पापरूपोऽयं देहः, शुद्धात्मा तु व्यवहारेण देहस्थोऽपि निश्चयेन
पापरूपदेहाद्भिन्नत्वादत्यन्तपवित्रः । त्रिभुवनस्थाशुचिद्रव्यैर्निर्मितत्वादशुचिरूपोऽयं देहः, शुद्धात्मा
तु व्यवहारेण देहस्थोऽपि निश्चयेन देहात्पृथग्भूतत्वादत्यन्तनिर्मल इति । अत्रैवं देहेन सह
शुद्धात्मनो भेदं ज्ञात्वा निरन्तरं भावना कर्तव्येति तात्पर्यम् ।।१५०।।
अथ —
भावार्थ : — तीन लोकमें जितने दुःख हैं, उनसे यह देह रचा गया है, इससे दुःखरूप
है, और आत्मद्रव्य व्यवहारनयकर देहमें स्थित है, तो भी निश्चयनयकर देहसे भिन्न
निराकुलस्वरूप सुखरूप है, तीन लोकमें जितने पाप हैं, उन पापोंसे यह शरीर बनाया गया
है, इसलिये यह देह पापरूप ही है, इससे पाप ही उत्पन्न होता है, और चिदानंद चिद्रूप जीव
पदार्थ व्यवहारनयसे देहमें स्थित है, तो भी देहसे भिन्न अत्यंत पवित्र है, तीन जगत्में जितने
अशुचि पदार्थ हैं, उनको इकट्ठेकर यह शरीर निर्माण किया है, इसलिये महा अशुचिरूप है,
और आत्मा व्यवहारनयकर देहमें विराजमान है, तो भी देहसे जुदा परम पवित्र है । इसप्रकार
देहका और जीवका अत्यंत भेद जानकर निरन्तर आत्माकी भावना करनी चाहिये ।।१५०।।
आगे फि र भी देहको अपवित्र दिखलाते हैं —