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yogIndudevavirachita
[ adhikAr-2 dohA-159
शून्यं पदं ध्यायतां पुनः पुनः (?) योगिनाम् ।
समरसीभावं परेण सह पुण्यमपि पापं न येषाम् ।।१५९।।
सुण्णउं पउं इत्यादि । सुण्णउं शुभाशुभमनोवचनकायव्यापारैः शून्यं पउं वीतराग-
परमानन्दैकसुखामृतरसास्वादरूपा स्वसंवित्तिमयी या सा परमकला तया भरितावस्थापदं
निजशुद्धात्मस्वरूपं झायंताहं वीतरागत्रिगुप्तिसमाधिबलेन ध्यायतां बलि बलि जोइयडाहं
श्रीयोगीन्द्रदेवाः स्वकीयाभ्यन्तरगुणानुरागं प्रकटयन्ति, बलिं क्रियेऽहमिति परमयोगिनां प्रशंसां
कुर्वन्ति । येषां किम् । समरसि-भाउ वीतरागपरमाह्लादसुखेन परमसमरसीभावम् । केन सह ।
गाथा – १५९
अन्वयार्थ : — [शून्यं पदं ध्यायतां ] विकल्प रहित ब्रह्मपदको ध्यावनेवाले
[योगिनाम् ] योगियोंकी मैं [बलिं बलिं ] बार बार मस्तक नमाकर पूजा करता हूँ, [येषाम् ]
जिन योगियोंके [परेण सह ] अन्य पदार्थोंके साथ [समरसीभावं ] समरसीभाव है, और
[पुण्यम् पापं अपि न ] जिनके पुण्य और पाप दोनों ही उपादेय नहीं हैं ।
भावार्थ : — शुभ – अशुभ मन, वचन, कायके व्यापार रहित जो वीतराग परमआनंदमयी
सुखामृत – रसका आस्वाद वही उसका स्वरूप है, ऐसी आत्मज्ञानमयी परमकलाकर भरपूर जो
ब्रह्मपद – शून्यपद – निज शुद्धात्मस्वरूप उसको ध्यानी राग रहित तीन गुप्तिरूप समाधिके बलसे
ध्यावते हैं, उन ध्यानी योगियोंकी मैं बार बार बलिहारी करता हूँ, ऐसे श्रीयोगींद्रदेव अपना
अन्तरंगका धर्मानुराग प्रगट करते हैं, और परम योगीश्वरोंके परम स्वसंवेदनज्ञान सहित महा
समरसीभाव है । समरसीभावका लक्षण ऐसा है, कि जिनके इंद्र और कीट दोनों समान,
चिंतामणिरत्न और कंकड़ दोनों समान हों । अथवा ज्ञानादि गुण और गुणी निज शुद्धात्म द्रव्य
इन दोनोंका एकीभावरूप परिणमन वह समरसीभाव है, उसकर सहित हैं, जिनके पुण्य-पाप दोनों
(samarasIbhAvanun lakShaN A chhe ke gnAnAdiguN ane guNI (nijashuddhAtmadravya) e bannenun
ekIbhAvarUp pariNaman te samarasIbhAv chhe.)
bhAvArtha — shubhAshubh manavachanakAyanA vyApArathI shUnya ane ek (kevaL) vItarAg
paramAnandarUp sukhAmRutarasanA AsvAdarUp svasamvedanamay je paramakaLA tenAthI paripUrNa
nijashuddhAtma svarUpanun vItarAg traN guptithI yukta samAdhinA baLathI dhyAn karanArAo pratye
shrI yogIndradev potAno abhyantar (antarano) guNAnurAg pragaT kare chhe. te param yogIo
par hun shrI yogIndradev – pharI pharI balihArI karun chhun – pharI pharI vArI jAun chhun, em kahIne
teo te paramayogIonI prashansA kare chhe ke je paramayogIone svasamvedyamAn paramAtmAnI sAthe