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yogIndudevavirachita
[ adhikAr-2 dohA-163
च कुम्भकरेचकपूरकादिरूपो वायुनिरोधो न ग्राह्यः किंतु स्वयमनीहितवृत्त्या
निर्विकल्पसमाधिबलेन दशमद्वारसंज्ञेन ब्रह्मरन्ध्रसंज्ञेन सूक्ष्माभिधानरूपेण च तालुरन्ध्रेण योऽसौ
गच्छति स एव ग्राह्यः तत्र । यदुक्तं केनापि — ‘‘मणु मरइ पवणु जहिं खयहं जाइ । सव्वंगइ
तिहुवणु तहिं जि ठाइ । मूढा अंतरालु परियाणहि । तुट्टइ मोहजालु जइ जाणहि ।।’’ अत्र
पूर्वोक्त लक्षणमेव मनोमरणं ग्राह्यं पवनक्षयोऽपि पूर्वोक्त लक्षण एव त्रिभुवनप्रकाशक आत्मा
तत्रैव निर्विकल्पसमाधौ तिष्ठतीत्यर्थः । अन्तरालशब्देन तु रागादिपरभावशून्यत्वं ग्राह्यं न
चाकाशे ज्ञाते सति मोहजालं नश्यति न चान्याद्रशं परकल्पितं ग्राह्यमित्यभिप्रायः ।।१६३।।
dashamadvAr nAmanA brahmarandhra sangnAvALA ane sUkShma abhidhAnarUp tAlurandhramAnthI je (vAyu) nIkaLe
chhe te ja tyAn levo. vaLI, kahyun paN chhe ke-‘‘मणु मरई पवणु जहिं खयहं जाइ । सव्वंगइ तिहुवणु
तहिं जि ठाइ । मूढा अंतरालु परियाणहि । तुÿइ मोहजालु जइ जाणहि ।।’’ (artha — mUDh
agnAnIoj ‘ambar’no artha AkAsh samaje chhe. paN jo ‘ambar’no artha paramasamAdhi jANe
to man marI jAy chhe, pavanano sahaj kShay thAy chhe. mohajAL nAsh pAme chhe ane sarva ang
tribhuvananI samAn thaI jAy chhe (arthAt kevaLagnAn thavAthI temAn traN lok jaNAy chhe).
ahIn, pUrvokta lakShaNavALun ja manomaraN samajavun, pavanakShay paN pUrvokta lakShaNavALo ja
samajavo, tribhuvanaprakAshak AtmA te nirvikalpa samAdhimAn ja rahe chhe evo artha chhe. ‘antarAl’
shabdathI to rAgAdi parabhAvanun shUnyapaNun samajavun paN AkAshane jANatAn mohajAL nAsh pAmatI
nathI, tethI (‘antarAl’ shabdathI) anye batAvelun parakalpit (AkAsh) na samajavun, evo
abhiprAy chhe. 163.
निर्विकल्पसमाधिके बलसे ब्रह्मद्वार नामा सूक्ष्म छिद्र जिसको तालुवेका रंध्र कहते हैं, उसके
द्वारा अवाँछिक वृत्तिसे पवन निकलता है, वह लेना । ध्यानी मुनियोंके पवन रोकनेका यत्न
नहीं होता है , बिना ही यत्नके सहज ही पवन रुक जाता है, और मन भी अचल हो जाता
है, ऐसा समाधिका प्रभाव है । ऐसा दूसरी जगह भी कहा है, कि जो मूढ है, वे तो अम्बरका
अर्थ आकाशको जानते हैं, और जो ज्ञानीजन हैं, वे अम्बरका अर्थ परमसमाधिरूप निर्विकल्प
जानते हैं । सो निर्विकल्प ध्यानमें मन मर जाता है, पवनका सहज ही विरोध होता है, और
सब अंग तीन भुवनके समान हो जाता है । जो परमसमाधिको जाने, तो मोह टूट जावे । मनके
विकल्पोंका मिटना वही मनका मरना है, और वही श्वासका रुकना है, जो कि सब द्वारोंसे
रुककर दशवें द्वारमेंसे होकर निकले । तीन लोकका प्रकाशक आत्माको निर्विकल्पसमाधिमें
स्थापित करता है । अंतराल शब्दका अर्थ रागादि भावोंसे शून्यदशा लेना आकाशका अर्थ न
लेना । आकाशके जाननेसे मोह-जाल नहीं मिटता, आत्मस्वरूपके जाननेसे मोह-जाल मिटता
है । जो पातञ्जलि आदि परसमयमें शून्यरूप समाधि कही है, वह अभिप्राय नहीं लेना,