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yogIndudevavirachita
[ adhikAr-2 dohA-166-167
णवि ‘‘शिवं परमकल्याणं निर्वाणं शान्तमक्षयम् । प्राप्तं मुक्ति पदं येन स शिवः
परिकीर्तितः ।।’’ इति वचनात् शिवशब्दवाच्यो योऽसौ मोक्षस्तस्य मार्गोऽपि न ज्ञातः ।
कथंभूतो मार्गः । स्वशुद्धात्मसम्यक्श्रद्धानज्ञानानुचरणरूपः । यत्र मार्गे किम् । जहिं जोहहिं
अणुराउ यत्र निश्चयमोक्षमार्गे परमयोगिनामनुरागस्तात्पर्यम् । न केवलं मोक्षमार्गोऽपि न
ज्ञातः । घोरु ण चिण्णउ तव-चरणु घोरं दुर्धरं परीषहोपसर्गजयरूपं नैव चीर्णं न कृतम् ।
किं तत् । अनशनादिद्वादशविधं तपश्चरणम् । यत्कथंभूतम् । जं णिय-बोहहं सारु
यत्तपश्चरणं वीतरागनिर्विकल्पस्वसंवेदनलक्षणेन निजबोधेन सारभूतम् । पुनश्च किं न कृतम् ।
पुण्णु वि पाउ वि निश्चयनयेन शुभाशुभनिगलद्वयरहितस्य संसारिजीवस्य व्यवहारेण
सुवर्णलोह-निगलद्वयसद्रशं पुण्यपापद्वयमपि दड्ढु णवि शुद्धात्मद्रव्यानुभवरूपेण ध्यानाग्निना
दग्धं नैव । किमु छिज्जइ संसारु कथं छिद्यते संसार इति । अत्रेदं व्याख्यानं ज्ञात्वा निरन्तरं
karyo ‘‘शिवं परमकल्याणं निर्वाणं शान्तमक्षयम् । प्राप्तं मुक्ति पदं येन स शिवः परिकीर्तितः’’ ।। (Apta
svarUp 24) [arthar : — shivarUp, (paramakalyANarUp, nirvANarUp, shAnt ane akShay muktipad
jeNe prApta karyun chhe te shiv chhe) e vachanAnusAre ‘shiv’ shabdathI vAchya je mokSha chhe tenA svashuddha
AtmAnAn samyakshraddhAn, samyaggnAn ane samyaganucharaNarUp mArgane paN-ke je
nishchayamokShamArgamAn paramayogIone anurAg – tAtparya chhe tene paN jANyo nahi, kevaL
mokShamArgane jANyo nahi eTalun ja nahi paN je vItarAg nirvikalpa svasamvedan jenun lakShaN chhe
evA nijabodhathI sArabhUt ghor, durdhar pariShah, ghor, durdhar upasarganA jayarUp anashanAdi bAr
prakAranun tapashcharaN karyun nahi ane nishchayanayathI shubhAshubh banne beDIthI rahit evA
sansArIjIvanAn, vyavahAranayathI sonAnI ane loDhAnI be beDI jevAn puNya ane pAp bannene paN
shuddha AtmadravyanA anubhavarUp dhyAnanI agni vaDe bALyAn nahi to sansAr kevI rIte chhedAy?]
दास, कुप्य (वस्त्र तथा सुगंधादिक), भांड (बर्तन आदि) ये दस तरहके बाहरके परिग्रह,
इसप्रकार बाह्य अभ्यंतर परिग्रहके चौबीस भेद हुए, इनको नहीं छोड़ा । जीवित, मरण, सुख, दुःख,
लाभ, अलाभादिमें समान भाव कभी नहीं किया, कल्याणरूप मोक्षका मार्ग सम्यग्दर्शन ज्ञान
चारित्र भी नहीं जाना । निजस्वरूपका श्रद्धान, निजस्वरूपका ज्ञान और निजस्वरूपका आचरण
निश्चयरत्नत्रय तथा नव पदार्थोंका श्रद्धान, नव पदार्थोंका ज्ञान और अशुभ क्रियाके त्यागरूप
व्यवहाररत्नत्रय — ये दोनों ही मोक्षके मार्ग हैं, इन दोनोंमेंसे निश्चयरत्नत्रय तो साक्षात् मोक्षका मार्ग
है, और व्यवहाररत्नत्रय परम्पराय मोक्षका मार्ग है । ये दोनों मैंने कभी नहीं जाने, संसारका ही मार्ग
जाना । अनशनादि बारह प्रकारका तप नहीं किया, बाईस परीषह नहीं सहन की । तथा पुण्य
सुवर्णकी बेड़ी, पाप लोहेकी बेड़ी, ये दोनों बंधन निर्मल आत्मध्यानरूपी अग्निसे भस्म नहीं