adhikAr-2 dohA-168 ]paramAtmaprakAsha [ 491
शुद्धात्मद्रव्यभावना कर्तव्येति तात्पर्यम् ।।१६६-६७।।
अथ दानपूजापश्चपरमेष्ठिवन्दनादिरूपं परंपरया मुक्ति कारणं श्रावकधर्मं कथयति —
२९९) दाणु ण दिण्णउ मुणिवरहँ ण वि पुज्जिउ जिण-णाहु ।
पंच ण वंदिय परम-गुरू किमु होसइं सिव-लाहु ।।१६८।।
दानं न दत्तं मुनिवरेभ्यः नापि पूजितः जिननाथः ।
पञ्च न वन्दिताः परमगुरवः किं भविष्यति शिवलाभः ।।१६८।।
दाणु इत्यादि । दाणु ण दिण्णउ आहाराभयभैषज्यशास्त्रभेदेन चतुर्विधदानं भक्ति पूर्वकं
न दत्तम् । केषाम् । मुणिवरहं निश्चयव्यवहाररत्नत्रयाराधकानां मुनिवरादिचतुर्विधसंघस्थितानां
ahIn, A vyAkhyAn jANIne nirantar shuddha AtmadravyanI bhAvanA karavI joIe, evun
tAtparya chhe. 166-167.
have dAn, pUjA ane panchaparameShThIonI vandanA AdirUp paramparAe muktinun kAraN
evA shrAvakadharmanun kathan kare chhe —
bhAvArtha — nishchay vyavahAraratnatrayanA ArAdhak munivarAdi chaturvidh sanghamAn sthit
pAtrone AhAradAn, abhayadAn, auShadhadAn ane shAstradAn e chAr prakAranA dAn ApyAn
किये । इन बातोंके बिना किये संसारका विच्छेद नहीं होता, संसारसे मुक्त होनेके ये ही कारण
हैं । ऐसा व्याख्यान जानकर सदैव शुद्धात्मस्वरूपकी भावना करनी चाहिए ।।१६६-१६७।।
आगे दान, पूजा और पंचपरमेष्ठीकी वंदना, आदि परम्परा मुक्तिका कारण जो
श्रावकधर्म उसे कहते हैं —
गाथा – १६८
अन्वयार्थ : — [दानं ] आहारादि दान [मुनिवराणां ] मुनिश्वर आदि पात्रोंको [न दत्तं ]
नहीं दिया, [जिननाथः ] जिनेन्द्रभगवानको भी [नापि पूजितः ] नहीं पूजा, [पंच परमगुरवः ]
अरहंत आदिक पंचपरमेष्ठी [न वंदिताः ] भी नहीं पूजे, तब [शिवलाभः ] मोक्षकी प्राप्ति [किं
भविष्यति ] कैसे हो सकती है ?
भावार्थ : — आहार, औषध, शास्त्र और अभयदान — ये चार प्रकारके दान भक्तिपूर्वक
पात्रोंको नहीं दिये, अर्थात् निश्चय व्यवहाररत्नत्रयके आराधक जो यती आदिक चार प्रकार संघ