502 ]
yogIndudevavirachita
[ adhikAr-2 dohA-176
एव तत्सदश एव मुक्ति गतपरमात्मा । कथंभूतः । परु परमगुणयोगात् पर उत्कृष्टः एहउ
भावि इत्थंभूतं परमात्मानं भावय । हे प्रभाकरभट्ट । कथंभूतः सन् । णिभंतु भ्रान्तिरहितः
संशयरहितः सन्निति । अत्र स्वदेहेऽपि शुद्धात्मास्तीति निश्चयं कृत्वा मिथ्यात्वाद्युपशमवशेन
केवलज्ञानाद्युत्पत्तिबीजभूतां कारणसमयसाराख्यामागमभाषया वीतरागसम्यक्त्वादिरूपां शुद्धात्मैक-
देशव्यक्तिं लब्ध्वा सर्वतात्पर्येण भावना कर्तव्येत्यभिप्रायः ।।१७५।।
अथामुमेवार्थं द्रष्टान्तदार्ष्टान्ताभ्यां समर्थयति —
३०७) णिम्मल-फलिहहँ जेम जिय भिण्णउ परकिय-भाउ ।
अप्प-सहावहँ तेम मुणि सयलु वि कम्म-सहाउ ।।१७६।।
निर्मलस्फ टिकाद् यथा जीव भिन्नः परकृतभावः ।
आत्मस्वभावात् तथा मन्यस्व सकलमपि कर्मस्वभावम् ।।१७६।।
ahIn, potAnA dehamAn paN shuddha AtmA chhe evo nirNay karIne mithyAtvAdi upashamanA
vashe kevaLagnAnAdinI utpattinA bIjarUp, AgamabhAShAe kAraNasamayasAr nAmanI vItarAg
samyaktvAdirUp shuddhAtmAnI ekadeshavyakti pAmIne sarvatAtparyathI bhAvanA karavI joIe, evo
abhiprAy chhe. 175.
have, A ja arthanun draShTAnt-dArShTAntathI samarthan kare chhe —
शब्द देहमें स्थित आत्माको कहता है । और सः यह शब्द मुक्ति प्राप्त परमात्मामें लगाना ।
जो परमात्मा वह मैं हूँ, और मैं हूँ सो परमात्मा — यही ध्यान हमेशा करना । वह परमात्मा
परमगुणके संबंधसे उत्कृष्ट है । श्रीयोगीन्द्राचार्य प्रभाकरभट्टसे कहते हैं, कि हे प्रभाकरभट्ट, तू
सब विकल्पोंको छोड़कर केवल परमात्माका ध्यान कर । निस्संदेह होके इस देहमें शुद्धात्मा
है, ऐसा निश्चय कर । मिथ्यात्वादि सब विभावोंकी उपशमताके वशसे केवलज्ञानादि उत्पत्तिका
जो कारण समयसार (निज आत्मा) उसीकी निरन्तर भावना करनी चाहिये । वीतराग
सम्यक्त्वादिरूप शुद्ध आत्माका एकदेश प्रगटपनेको पाकर सब तरहसे ज्ञानकी भावना योग्य
है ।।१७५।।
आगे इसी अर्थको दृष्टान्त दार्ष्टान्तसे पुष्ट करते हैं —
गाथा – १७६
अन्वयार्थ : — [जीव ] हे जीव [यथा ] जैसे [परकृतभावः ] नीचेके सब डंक