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yogIndudevavirachita
[ adhikAr-2 dohA-183
जं यत् भुंजेवउ होइ भोक्त व्यं भवति । किं कृत्वा । उदयहं आणिवि
विशिष्टात्मभावनाबलेनोदयमानीय । किम् । कम्मु चिरसंचितं । कर्म । केन । मइं मया तं तत्
पूर्वोक्तं कर्म सह आविउ दुर्धरपरीषहोपसर्गवशेन स्वयमुदयमागतं सत् खविउ मइं
निजपरमात्मतत्त्वभावनोत्पन्नवीतरागसहजानन्दैकसुखरसास्वादद्रवीभूतेन परिणतेन मनसा क्षपितं
मया सो स परं नियमेन लाहु जि लाभ एव कोइ कश्चिदपूर्व इति । अत्र केचन महापुरुषा
दुर्धरानुष्ठानं कृत्वा वीतरागनिर्विकल्पसमाधौ स्थित्वा च कर्मोदयमानीय तमनुभवन्ति, अस्माकं
पुनः स्वयमेवोदयागतमिति मत्वा संतोषः कर्तव्य इति तात्पर्यम् ।।१८३।।
bhAvArtha — je chirasanchit karmane vishiShTa AtmabhAvanAnA baLathI udayamAn lAvIne mAre
bhogavI levA yogya chhe te pUrvokta karma durdhar pariShah, upasarganA vashathI svayam udayamAn Avyun
ane nij paramAtmatattvanI bhAvanAthI utpanna ek (kevaL) vItarAg sahajAnandamay
sukharasAsvAdarUpe dravIbhUt – pariNamel – man vaDe men tene kShay karyun te niyamathI koI apUrva lAbh
ja chhe.
ahIn, koI mahApuruSho durdhar anuShThAn karIne ane vItarAg nirvikalpa samAdhimAn sthit
thaIne karmane udayamAn lAvIne tene anubhave chhe, tyAre amane to karma svayamev udayamAn AvyAn
em jANIne santoSh karavo, evun tAtparya chhe. 183.
लाकर [भोक्तव्यं भवति ] भोगने चाहता था, [तत् ] वह कर्म [स्वयम् आगतं ] आप ही आ
गया, [मया क्षपितं ] इससे मैं शांत चित्तसे फल सहनकर क्षय करूँ, [स कश्चित् ] यह कोई
[परं लाभः ] महान् ही लाभ हुआ ।
भावार्थ : — जो महामुनि मुक्तिके अधिकारी हैं, उदयमें वे नहीं आये हुए कर्मोंको परम
आत्म – ज्ञानकी भावनाके बलसे उदयमें लाकर उसका फल भोगकर शीघ्र निर्जरा कर देते हैं ।
और जो वे पूर्वकर्म बिना उपायके सहज ही बाईस परीषह तथा उपसर्गके वशसे उदयमें आये
हों, तो विषाद न करना बहुत लाभ समझना । मनमें यह मानना कि हम तो उदीरणासे इन
कर्मोंको उदयमें लाकर क्षय करते, परंतु ये सहज ही उदयमें आये, वह तो बड़ा ही लाभ है ।
जैसे कोई बड़ा व्यापारी अपने ऊ परका कर्ज लोगोंको बुला बुलाके देता है, यदि कोई बिना
बुलाये सहज ही लेने आया हो, तो बड़ा ही लाभ है । उसी तरह कोई महापुरुष महान दुर्धर
तप करके कर्मोंको उदयमें लाके क्षय करते हैं, लेकिन वे कर्म अपने स्वयमेव उदयमें आये
हैं, तो इनके समान दूसरा क्या है, ऐसा संतोष धारणकर ज्ञानीजन उदय आये हुए कर्मोंको भोगते
हैं, परंतु राग-द्वेष नहीं करते ।।१८३।।