adhikAr-2 dohA-183 ]paramAtmaprakAsha [ 507
दुःक्खइं जेण जणेइ येन कारणेन दुःखानि जनयति सो परु तं परजनं जाणहि जानीहि ।
किम् । मित्तु परममित्रं तुहुं त्वं कर्ता । यः परः किं करोति । जो तणु एहु हणेइ यः कर्ता
तनुमिमां प्रत्यक्षीभूतां हन्तीति । अत्र यदा वैरी देहविनाशं करोति तदा वीतरागचिदानन्दैक-
स्वभावपरमात्मतत्त्वभावनोत्पन्नसुखामृतसमरसीभावे स्थित्वा शरीरघातकस्योपरि यथा पाण्डवैः
कौरवकुमारस्योपरि द्वेषो न कृतस्तथान्यतपोधनैरपि न कर्तव्य इत्यभिप्रायः ।।१८२।।
अथ उदयागते पापकर्मणि स्वस्वभावो न त्याज्य इति मनसि संप्रधार्य सूत्रमिदं
कथयति —
३१४) उदयहँ आणिवि कम्मु मइँ जं भुंजेवउ होइ ।
तं सह आविउ खविउ मइँ सो पर लाहु जि कोइ ।।१८३।।
उदयमानीय कर्म मया यद् भोक्त व्यं भवति ।
तत् स्वयमागतं क्षपितं मया स परं लाभ एव कश्चित् ।।१८३।।
bhAvArtha — ahIn jyAre verI dehano vinAsh kare chhe tyAre vItarAg chidAnand jeno ek
svabhAv chhe evA paramAtmatattvanI bhAvanAthI utpanna sukhAmRutarUp samarasIbhAvamAn sthir thaIne,
jevI rIte sharIranA haNanAr kauravakumAr upar pAnDavoe dveSh na karyo tevI rIte, sharIranA ghAtak
upar anya tapodhanoe paN dveSh na karavo joIe, e abhippAy chhe. 182.
have, udayamAn AvelA pApakarmamAn svabhAvano tyAg na karavo evo abhiprAy manamAn
rAkhIne A gAthAsUtra kahe chhe.
कर और जो तेरे शरीरकी सेवा करता है, उससे भी राग मत कर, तथा जो तेरे शरीरका घात
कर देवे, उसको शत्रु मत जान । जब कोई तेरे शरीरका विनाश करे, तब वीतराग चिदानंद
ज्ञानस्वभाव परमात्मतत्त्वकी भावनासे उत्पन्न जो परम समरसीभाव, उसमें लीन होकर शरीरके
घातक पर द्वेष मत कर । जैसे महा धर्मस्वरूप युधिष्ठिर पांडव आदि पाँचों भाइयों ने दुर्योधनादि
पर द्वेष नहीं किया । उसी तरह सभी साधुओंका यही स्वभाव है, कि अपने शरीरका जो घात
करे, उससे द्वेष नहीं करते, सबके मित्र ही रहते हैं ।।१८२।।
आगे पूर्वोपार्जित पापके उदयसे दुःख अवस्था आ जावे उसमें अपना धीरपना आदि
स्वभाव न छोड़े, ऐसा अभिप्राय मनमें रखकर व्याख्यान करते हैं —
गाथा – १८३
अन्वयार्थ : — [यत् ] जो [मया ] मैं [कर्म ] कर्मको [उदयम् आनीय ] उदयमें