Parmatma Prakash (Gujarati Hindi) (English transliteration). Gatha: 182 (Adhikar 2).

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yogIndudevavirachita
[ adhikAr-2 dohA-182
रक्तं जीर्णं नष्टं न मन्यते इति भावार्थः अथ मण्णइ मन्यते कोऽसौ णाणि
देहवस्त्रविषये भेदज्ञानी किं मन्यते भिण्णउ भिन्नम् किम् वत्थु जि वस्त्रमेव जेम
यथा जिय हे जीव कस्माद्भिन्नं मन्यते देहहं स्वकीयदेहात् द्रष्टान्तमाह मण्णइ
मन्यते कोऽसौ णाणि देहात्मनोर्भेदज्ञानी तहं तथा भिन्नं मन्यते कमपि देहु वि
देहमपि कस्मात् अप्पहं निश्चयेन देहविलक्षणाद्व्यवहारेण देहस्थात्सहजशुद्धपरमानन्दैक-
स्वभावान्निजपरमात्मनः जाणि जानीहीति भावार्थः ।।१७८--८१।।
अथ दुःखजनकदेहघातकं शत्रुमपि मित्रं जानीहीति दर्शयति
३१३) इहु तणु जीवड तुज्झ रिउ दुक्खइँ जेण जणेइ
सो परु जाणहि मित्तु तुहुँ जो तणु एहु हणेइ ।।१८२।।
इयं तनुः जीव तव रिपुः दुःखानि येन जनयति
तं परं जानीहि मित्रं त्वं यः तनुमेतां हन्ति ।।१८२।।
रिउ रिपुर्भवति का इहु तणु इयं तनुः कर्त्री जीवड हे जीव तुज्झ तव कस्मात्
he jIv! jevI rIte deh ane vastrano bhedagnAnI vastrane svakIy dehathI judun jANe chhe
tevI rIte deh ane AtmAno bhedagnAnI dehane nishchayathI dehathI vilakShaN, vyavahArathI dehastha
(vyavahAre dehamAn sthit) sahaj shuddha paramAnand jeno ek svabhAv chhe evA paramAtmAthI
bhinna jANe chhe, em tun jAN evo bhAvArtha chhe. 178-181.
have dukhajanak, dehaghAtak evA shatrune paN tun mitra jAN, em darshAve chhe
व्यवहारनयकर देहमें स्थित है, तो भी सहज शुद्ध परमानंदरूप निजस्वभावकर जुदा ही है, देहके
सुख
दुःख जीवमें नहीं हैं ।।१७८८१।।
आगे दुःख उत्पन्न करनेवाला शत्रुरूप यह देह है, उसको तू मित्र मत समझ, ऐसा कहते
हैं
गाथा१८२
अन्वयार्थ :[जीव ] हे जीव, [इयं तनुः ] यह शरीर [तव रिपुः ] तेरा शत्रु है,
[येन ] क्योंकि [दुःखानि ] दुःखोंको [जनयति ] उत्पन्न करता है, [यः ] जो [इमां तनुं ] इस
शरीरका [हंति ] घात करे, [तं ] उसको [त्वं ] तुम [परं मित्रं ] परममित्र [जानीहि ] जानो
भावार्थ :यह शरीर तेरा शत्रु होनेसे दुःख उत्पन्न करता है, इससे तू अनुराग मत