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yogIndudevavirachita
[ adhikAr-2 dohA-186
अथ परेण दोषग्रहणे कृते कोपो न कर्तव्य इत्यभिप्रायं मनसि संप्रधार्य सूत्रमिदं
प्रतिपादयति —
३१७) अवगुण-गहणइँ महुतणइँ जइ जीवहँ संतोसु ।
तो तहँ सोक्खहं हेउ हउँ इउ मण्णिवि चइ रोसु ।।१८६।।
अवगुणग्रहणेन मदीयेन यदि जीवानां संतोषः ।
ततः तेषां सुखस्य हेतुरहं इति मत्वा त्यज रोषम् ।।१८६।।
जइ जीवहं संतोसु यदि चेदज्ञानिजीवानां संतोषो भवति । केन । अवगुण-गहणइं
निर्दोषिपरमात्मनो विलक्षणा ये दोषा अवगुणास्तेषां ग्रहणेन । कथंभूतेन महुतणइं मदीयेन ताे
तहं सोक्खहं हेउ हउँ यतः कारणान्मदीयदोषग्रहणेन तेषां सुखं जातं ततस्तेषामहं सुखस्य
हेतुर्जातः इउ मण्णिवि चउ रोसु केचन परोपकारनिरताः परेषां द्रव्यादिकं दत्त्वा सुखं कुर्वन्ति
have, jo bIjA koIne potAno doSh grahaN karavAthI santoSh thAy chhe to (tenA par)
kop na karavo, evo abhiprAy manamAn rAkhIne A sUtra kahe chhe —
bhAvArtha — nirdoSh paramAtmAthI vilakShaN je mArA doSho chhe temanA grahaNathI jo
agnAnI jIvone santoSh thAy chhe to mArA doSh grahaN karavAthI temane sukh thayun tethI temanA
sukhano hetu hun thayo. keTalAk paropakAramAn rat puruSho to bIjAone dhanAdik ApIne sukhI
kare chhe, ane men to temane dhanAdik ApyA sivAy sukhI karyA em mAnIne roSh chhoD
आगे जो कोई अपने दोष ग्रहण करे तो उस पर क्रोध नहीं करना, क्षमा करना, यह
अभिप्राय मनमें रखकर व्याख्यान करते हैं —
गाथा – १८६
अन्वयार्थ : — [मदीयेन अवगुणग्रहणेन ] अज्ञानी जीवोंको परके दोष ग्रहण करनेसे
हर्ष होता है, मेरे दोष ग्रहण करके [यदि जीवानां संतोषः ] जिन जीवोंको हर्ष होता है, [ततः ]
तो मुझे यही लाभ है, कि [अहं ] मैं [तेषां सुखस्य हेतुः ] उनको सुखका कारण हुआ, [इति
मत्वा ] ऐसा मनमें विचारकर [रोषम् त्यज ] गुस्सा छोड़ो ।
भावार्थ : — ज्ञानी गुस्सा नहीं करते, ऐसा विचारते हैं, कि जो कोई परका उपकार
करनेवाले परजीवोंको द्रव्यादि देकर सुखी करते हैं, मैंने कुछ द्रव्य नहीं दिया, उपकार नहीं
किया, मेरे अवगुण ही से सुखी हो गये, तो इसके समान दूसरी क्या बात है ? ऐसा