Parmatma Prakash (Gujarati Hindi) (English transliteration).

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yogIndudevavirachita
[ adhikAr-2 dohA-192
विषयकषायानपि निर्दल्य ये न समाधिं कुर्वन्ति
ते परमात्मनः योगिन् नैव आराधका भवन्ति ।।१९२।।
जे ये केचन ण करंति न कुर्वन्ति कम् समाहि त्रिगुप्तिगुप्त परमसमाधिम् किं
कृत्वा पूर्वम् णिद्दलिवि निर्मूल्य कानपि विषय-कसाय वि निर्विषयकषायात्
शुद्धात्मतत्त्वात् प्रतिपक्षभूतान् विषयकषायानपि ते णवि आराहय होंति ते नैवाराधका
भवन्ति
जोइया हे योगिन्
कस्याराधका न भवन्ति परमप्पहं निर्दोषिपरमात्मन इति
तथाहि विषयकषायनिवृत्तिरूपं शुद्धात्मानुभूतिस्वभावं वैराग्यं, शुद्धात्मोपलब्धिरूपंतत्त्वविज्ञानं,
बाह्याभ्यन्तरपरिग्रहपरित्यागरूपं नैर्ग्रन्थ्यं, निश्चितात्मानुभूतिरूपा वशचित्तता, वीतरागनिर्विकल्प-
समाधिबहिरङ्गसहकारिभूतं जितपरिषहत्वं चेति पञ्चैतान् ध्यानहेतून् ज्ञात्वा भावयित्वा च
bhAvArthahe yogI! je koI viShayakaShAy rahit-shuddha-AtmatattvathI pratipakShabhUt
viShayakaShAyone paN nirmUL karIne (mULamAnthI ukheDIne) traN guptithI gupta paramasamAdhine karatA
nathI, teo nirdoSh paramAtmAnA ArAdhako ja nathI.
bhAvArtha(1) viShayakaShAyanI nivRuttirUp ane shuddhaAtmAnI anubhUti-svabhAvavALo
vairAgya, (2) shuddha AtmAnI upalabdhirUp tattvavignAn, (3) bAhya abhyantar parigrahanA tyAgarUp
nirgranthapaNun, (4) nishchit AtmAnI anubhUtirUp chittavashatA (manojay) ane (5) vItarAg
nirvikalpa samAdhinA bahirang sahakArIbhUt pariShahajay e pAnch dhyAnanA hetu jANIne ane tene
गाथा१९२
अन्वयार्थ :[ये ] जो [विषयकषायानपि ] समाधिको धारणकर विषय कषायोंको
[निर्दल्य ] मूलसे उखाड़कर [समाधिं ] तीन गुप्तिरूप परमसमाधिको [न कुर्वंति ] नहीं धारण
करते, [ते ] वे [योगिन् ] हे योगी, [परमात्माराधकाः ] परमात्माके आराधक [नैव भवंति ]
नहीं हैं
भावार्थ :ये विषय कषाय शुद्धात्मतत्त्वके शत्रु हैं, जो इनका नाश न करे, वह
स्वरूपका आराधक कैसा ? स्वरूपको वही आराधता है, जिसके विषय कषायका प्रसंग न
हो, सब दोषोंसे रहित जो निज परमात्मा उसकी आराधनाके घातक विषय कषायके सिवाय
दूसरा कोई भी नहीं है
विषय कषायकी निवृत्तिरूप शुद्धात्माकी अनुभूति वह वैराग्यसे ही देखी
जाती है इसलिये ध्यानका मुख्य कारण वैराग्य है जब वैराग्य हो तब तत्त्वज्ञान निर्मल हो,
सो वैराग्य और तत्त्वज्ञान ये दोनों परस्परमें मित्र हैं ये ही ध्यानके कारण हैं, और बाह्याभ्यन्तर
परिग्रहके त्यागरूप निर्ग्रन्थपना वह ध्यानका कारण है निश्चित आत्मानुभूति ही है स्वरूप