adhikAr-2 dohA-191 ]paramAtmaprakAsha [ 521
इति मत्वा तत्साधकत्वेन तदनुकूलं तपश्चरणं करोति तत्परिज्ञानसाधकं च पठति तदा
परंपरया मोक्षसाधकं भवति, नो चेत् पुण्यबन्धकारणं तमेवेति । निर्विकल्पसमाधिरहिताः
सन्तः आत्मरूपं न पश्यन्ति । तथा चोक्त म् — ‘‘आनन्दं ब्रह्मणो रूपं निजदेहे व्यवस्थितम् ।
ध्यानहीना न पश्यन्ति जात्यन्धा इव भास्करम् ।।’’ ।।१९१।।
अथ —
३२३) विषय-कसाय वि णिद्दलिवि जे ण समाहि करंति ।
ते परमप्पहँ जोइया णवि आराहय होंति ।।१९२।।
ahIn, tAtparya em chhe ke jo nij shuddha AtmA ja upAdey chhe em jANIne
tenA sAdhakapaNe tene anukUL tapashcharaN kare chhe ane tenA gnAnanA sAdhak shAstrane bhaNe chhe
to te paramparAe mokShanun sAdhak chhe, nahi to te (tapashcharaN ane shAstraadhyayan) mAtra
puNyabandhanun ja kAraN chhe. jeo nirvikalpa samAdhi rahit chhe te santo AtmarUpane dekhI
shakatA nathI. vaLI kahyun chhe ke
‘‘आनन्दं ब्रह्मणो रूपं निजदेहे व्यवस्थितम् । ध्यानहीना न पश्यन्ति
जात्यन्धा इव भास्करम् ।।’’ artha — brahmanun rUp Anand chhe, te potAnA dehamAn rahelo chhe.
jevI rIte janmAndh puruSho sUryane dekhI shakatA nathI tevI rIte dhyAnathI rahit puruSho tene
joI shakatA nathI. 191.
vaLI (have viShayakaShAyano niShedh kare chhe) —
वह परमसमाधिके बिना तप करता हुआ और श्रुत पढ़ता हुआ भी निर्मल ज्ञान दर्शनरूप
तथा इस देहमें बिराजमान ऐसे निज परमात्माको नहीं देख सकता । जो आत्मस्वरूप राग
द्वेष मोह रहित परमशांत है । परमसमाधिके बिना तप और श्रुतसे भी शुद्धात्माको नहीं देख
सकता । जो निज शुद्धात्माको उपादेय जानकर ज्ञानका साधक तप करता है, और ज्ञानकी
प्राप्तिका उपाय जो जैनशास्त्र उनको पढ़ता है, तो परम्परा मोक्षका साधक है । और जो
आत्माके श्रद्धान बिना कायक्लेशरूप तप ही करे, तथा शब्दरूप ही श्रुत पढ़े, तो मोक्षका
कारण नहीं है, पुण्यबंधके कारण होते हैं । ऐसा ही परमानंदस्तोत्रमें कहा है, कि जो
निर्विकल्प समाधि रहित जीव हैं, वे आत्मस्वरूपको नहीं देख सकते । ब्रह्मका रूप आनंद
है, वह ब्रह्म निज देहमें मौजूद है; परंतु ध्यानसे रहित जीव ब्रह्मको नहीं देख सकते, जैसे
जन्मका अंधा सूर्यको नहीं देख सकता है ।।१९१।।
आगे विषय कषायोंका निषेध करते हैं —