Parmatma Prakash (Gujarati Hindi) (English transliteration).

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yogIndudevavirachita
[ adhikAr-2 dohA-191
घोरं कुर्वन् अपि तपश्चरणं सकलान्यपि शास्त्राणि मन्यमान
परमसमाधिविवर्जितः नैव पश्यति शिवं शान्तम् ।।१९१।।
करंतु वि कुर्वाणाऽपि किम् तव-चरणु समस्तपरद्रव्येच्छावर्जितं शुद्धात्मा-
नुभूतिरहितं तपश्चरणम् कथंभूतम् घोरु घोरं दुर्धरं वृक्षमूलातापनादिरूपम् न केवलं
तपश्चरणं कुर्वन् सयल वि सत्थ मुणंतु शास्त्रजनितविकल्पतात्पर्यरहितात् परमात्मस्वरूपात्
प्रतिपक्षभूतानि सर्वशास्त्राण्यपि जानन् इत्थंभूतोऽपि सन् परम-समाहि-विवज्जयउ यदि
चेद्रागादिविकल्परहितपरमसमाधिविवर्जितो भवति तर्हि णवि देक्खइ न पश्यति कम् सिउ
शिवं शिवशब्दवाच्यं विशुद्धज्ञानदर्शनस्वभावं स्वदेहस्थमपि च परमात्मानम् कथंभूतम् संत
रागद्वेषमोहरहितत्वेन शान्तं परमोपशमरूपमिति इदमत्र तात्पर्यम् यदि निजशुद्धात्मैवोपादेय
bhAvArthasamasta paradravyonI ichchhAthI rahit ane shuddhAtmAnI anubhUtithI rahit
evun, vRukShanA mULamAn ke AtapanAdirUp (varShAkALamAn vRukShanA mULanI samIpamAn, shItakALamAn
nadIkinAre ane grIShmakALamAn parvatanA shikhar par) durdhar tapashcharaN karavA chhatAn paN, vaLI
shAstrajanit vikalponA
tAtparyathI rahit evAparamAtmasvarUpathI pratipakShabhUt sarva shAstrone
jANavA chhatAn paN–(Avo hovA chhatAn paN) jo muni rAgAdivikalpathI rahit evI
paramasamAdhithI rahit chhe, to te rAgadveShamohasahit hovAthI paramopashamarUp shAnt, ‘shiv’ shabdathI
vAchya evA vishuddhagnAn, vishuddhadarshan jeno svabhAv chhe evA ane svadehamAn sthit paramAtmAne
dekhI shakato nathI.
गाथा१९१
अन्वयार्थ :[घोरं तपश्चरणं कुर्वन् अपि ] जो मुनि महा दुर्धर तपश्चरण करता
हुआ भी और [सकलानि शास्त्राणि ] सब शास्त्रोंको [जानन् ] जानता हुआ भी
[परमसमाधिविवर्जितः ] जो परमसमाधिसे रहित है, वह [शांतम् शिवं ] शांतरूप शुद्धात्माको
[नैव पश्यति ] नहीं देख सकता
।।
भावार्थ :तप उसे कहते हैं, कि जिसमें किसी वस्तुकी इच्छा न हो सो
इच्छाका अभाव तो हुआ नहीं, परंतु कायक्लेश करता है, शीतकालमें नदीके तीर,
ग्रीष्मकालमें पर्वतके शिखर पर, वर्षाकालमें वृक्षकी मूलमें महान् दुर्धर तप करता है
केवल तप ही नहीं करता शास्त्र भी पढ़ता है, सकल शास्त्रोंके प्रबंधसे रहित जो
निर्विकल्प परमात्मस्वरूप उससे रहित हुआ सीखता है, शास्त्रोंका रहस्य जानता है, परंतु
परमसमाधिसे रहित है, अर्थात् रागादि विकल्पसे रहित समाधि जिसके प्रगट न हुई, तो