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yogIndudevavirachita
[ adhikAr-2 dohA-193
परब्रह्मशब्दवाच्यं निजदेहस्थं केवलज्ञानाद्यनन्तगुणस्वभावं परमात्मस्वरूपम् । किं कृत्वा पूर्वम् ।
परम-समाहि धरेवि वीतरागतात्त्विकचिदानन्दैकानुभूतिरूपं परमसमाधिं धृत्वा ते पूर्वोक्त -
शुद्धात्मभावनारहिताः पुरुषाः सहंति सहन्ते । कानि कर्मतापन्नानि । भव-दुक्खइं वीतराग-
परमाह्लादरूपात् पारमार्थिकसुखात् प्रतिपक्षभूतानि नरनारकादिभवदुःखानि । कतिसंख्योपेतानि ।
बहुविहइं शारीरमानसादिभेदेन बहुविधानि । कियन्तं कालम् । कालु अणंतु अनन्तकाल-
पर्यन्तमिति । अत्रेदं व्याख्यानं ज्ञात्वा निजशुद्धात्मनि स्थित्वा रागद्वेषादिसमस्तविभावत्यागेन
भावना कर्तव्येति तात्पर्यम् ।।१९३।।
अथ —
३२५) जामु सुहासुह-भावडा णवि सयल वि तुट्टंति ।
परम – समाहि ण तामुमणि केवलि एहु भणंति ।।१९४।।
paramasamAdhine dhAraN karIne param brahmane-‘parabrahma’ shabdathI vAchya evA, nijadehamAn rahelA,
kevaLagnAnAdi anantaguNasvabhAvavALA paramAtmasvarUpane-pAmatA nathI (jANatA nathI) teo
– pUrvokta shuddha AtmAnI bhAvanAthI rahit puruSho-vItarAg param AhlAdarUp pAramArthik
sukhathI pratipakShabhUt, shArIrik, mAnasik Adi anek prakAranAn bhavadukhone sahe chhe.
ahIn, A vyAkhyAn jANIne nij shuddha AtmAmAn sthit thaIne rAgadveShAdi samasta
vibhAvanA tyAg vaDe (Atma) bhAvanA karavI joIe, evun tAtparya chhe. 193.
vaLI (have em kahe chhe ke jyAn sudhI A jIvanA badhA shubhAshubh bhAvo dUr
na thAy tyAn sudhI paramasamAdhi thaI shakatI nathI.) —
हैं, नाना प्रकारके दुःखोंको अज्ञानी जीव भोगता है । ये दुःख वीतराग परम आह्लादरूप जो
पारमार्थिक – सुख उससे विमुख हैं । यह जीव अनन्तकाल तक निजस्वरूपके ज्ञान बिना
चारों गतियोंके नाना प्रकारके दुःख भोग रहा है । ऐसा व्याख्यान जानकर निज शुद्धात्ममें
स्थिर होके राग द्वेषादि समस्त विभावोंका त्यागकर निज स्वरूपकी ही भावना करनी
चाहिये ।।१९३।।
आगे यह कहते हैं, कि जब तक इस जीवके शुभाशुभ भाव सब दूर न हों, तब तक
परमसमाधि नहीं हो सकती —