Parmatma Prakash (Gujarati Hindi) (English transliteration). Gatha: 196 (Adhikar 2).

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adhikAr-2 dohA-196 ]paramAtmaprakAsha [ 527
घातिकर्मचतुष्के विलयं गते सति किं कुर्वन् सन् पूर्वम् सिव-पय-मग्गि वसंतु शिवशब्द-
वाच्यं यन्मोक्षपदं तस्य योऽसौ सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्रत्रितयैकलक्षणो मार्गस्तस्मिन् वसन् सन्
केषां सताम् सयल-वियप्पहं तुट्टाहं समस्तविकल्पानां नष्टानां समस्तरागादिविकल्प-
विनाशादनन्तरं भवतीति भावार्थः ।।१९५।।
अथ
३२७) केवलणाणिं अणवरउ लोयालोउ मुणंतु
णियमेँ परमाणंदमउ अप्पा हुइ अरहंतु ।।१९६।।
केवलज्ञानेनानवरतं लोकालोकं मन्यमानः
नियमेन परमानन्दमयः आत्मा भवति अर्हन् ।।१९६।।
हुइ भवति कोऽसौ अप्पा आत्मा कथंभूतो भवति अरहंतु पूर्वोक्त लक्षणो
अर्हन् किं कुर्वन् लोयालोउ मुणंतु क्रमकरणव्यवधानरहितत्वेन कालत्रयविषयं लोकालोकं
vilay thatAn arhant thAy chhe. ari arthAt mohanIy karma teno nAsh thavAthI, rajasI arthAt
gnAnAvaraN, darshanAvaraN banneyano nAsh thavAthI ane rahasya shabdathI antarAy samajavo.
antarAyakarmano nAsh thavAthI devendrAdi rachit, atishayavAn (sAtishay) pUjAne yogya chhe te
arhant chhe, e bhAvArtha chhe. 195.
vaLI (have kevaLagnAnano mahimA kahe chhe)
bhAvArthalokAlokaprakAshak sakaL vimaL kevaLagnAnathI kram, karaN, vyavadhAn
केवलज्ञानीका नाम अर्हंत है, चाहे उसे जीवन्मुक्त कहो जब अरहंत हुआ, तब भावमोक्ष हुआ,
पीछे चार अघातियाकर्मोंको नाशकर सिद्ध हो जाता है सिद्धको विदेहमोक्ष कहते हैं यही
मोक्ष होनेका उपाय है ।।१९५।।
अब केवलज्ञानकी ही महिमा कहते हैं
गाथा१९६
अन्वयार्थ :[केवलज्ञानेन ] केवलज्ञानसे [लोकालोकं ] लोक-अलोकको
[अनवरतं ] निरन्तर [जानन् ] जानता हुआ [नियमेन ] निश्चयसे [परमानंदमयः ] परम
आनंदमयी [आत्मा ] यह आत्मा ही रत्नत्रयके प्रसादसे [अर्हन् ] अरहंत [भवति ] होता है
भावार्थ :समस्त लोकालोकको एक ही समयमें केवलज्ञानसे जानता हुआ अरहंत