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yogIndudevavirachita
[ adhikAr-2 dohA-197
वस्तु वस्तुरूपेण युगपत् जानन् सन् । केन । केवल-णाणि लोकालोकप्रकाशकसकल-
विमलकेवलज्ञानेन । कथम् । अणवरउ निरन्तरम् । किं विशिष्टो भवति भगवान् ।
परमाणंदमउ वीतरागपरमसमरसीभावलक्षणतात्त्विकपरमानन्दमयः । केन । णियमें निश्चयेन अत्र
संदेहो न कर्तव्य इत्यभिप्रायः ।।१९६।।
अथ —
३२८) जो जिणु केवल-णाणमउ परमाणंद – सहाउ ।
सो परमप्पउ परम – परु सो जिय अप्प – सहाउ ।।१९७।।
यः जिनः केवलज्ञानमयः परमानन्दस्वभावः ।
सः परमात्मा परमपरः स जीव आत्मस्वभावः ।।१९७।।
rahitapaNe traN kALanA viShayone, lokAlokanA padArthone vastusvarUpe nirantar yugapat jANato thako,
AtmA nishchayathI vItarAgaparamasamarasI bhAv svarUp tAttvik paramAnandamay lakShaNavALo arhant thAy
chhe emAn sandeh na karavo joIe, e abhiprAy chhe. 196.
vaLI (have em kahe chhe ke kevaLagnAn ja AtmAno nijasvabhAv chhe ane kevaLIne ja
paramAtmA kahe) —
कहलाता है । जिसका ज्ञान जाननेके क्रमसे रहित है । एक ही समयमें समस्त लोकालोकको
प्रत्यक्ष जानता है, आगे पीछे नहीं जानता । सब क्षेत्र, सब काल, सब भावको निरंतर प्रत्यक्ष
जानता है । जो केवलीभगवान् परम आनंदमयी हैं । वीतराग परमसमरसीभावरूप जो परम आनंद
अतीन्द्रिय अविनाशी सुख वही जिसका लक्षण है । निश्चयसे ज्ञानानंदस्वरूप है, इसमें संदेह
नहीं है ।।१९६।।
आगे ऐसा कहते हैं, कि केवलज्ञान ही आत्माका निजस्वभाव है, और केवलीको ही
परमात्मा कहते हैं —
गाथा – १९७
अन्वयार्थ : — [यः जिनः ] जो अनंत संसाररूपी वनके भ्रमणके कारण ज्ञानावरणादि
आठ कर्मरूपी बैरी उनका जीतनेवाला वह [केवलज्ञानमयः ] केवलज्ञानादि अनंत गुणमयी है
[परमानंदस्वभावः ] और इंद्रिय विषयसे रहित आत्मीक रागादि विकल्पोंसे रहित परमानंद ही
जिसका स्वभाव है, ऐसा जिनेश्वर केवलज्ञानमयी अरहंतदेव [सः ] वही [परमात्मा ] उत्कृष्ट