adhikAr-2 dohA-197 ]paramAtmaprakAsha [ 529
जो इत्यादि । जाे यः जिणु अनेकभवगहनव्यसनप्रापणहेतून् कर्मारातीन् जयतीति
जिनः । कथंभूतः । केवल-णाणमउ केवलज्ञानाविनाभूतानन्तगुणमयः । पुनरपि कथंभूतः ।
परमाणंद-सहाउ इन्द्रियविषयातीतः स्वात्मोत्थः रागादिविकल्परहितः परमानन्दस्वभावः सो
परमप्पउ स पूर्वोक्तोऽर्हन्नेव परमात्मा परम-परु प्रकृष्टानन्तज्ञानादिगुणरूपा मा लक्ष्मीर्यस्य
स भवति परमः संसारिभ्यः पर उत्कृष्टः इत्युच्यते परमश्चासौ परश्च परमपरः साे स
पूर्वोक्तो वीतरागः सर्वज्ञः जिय हे जीव अप्प-सहाउ आत्मस्वभाव इति । अत्र योऽसौ
पूर्वोक्त भणितो भगवान् स एव संसारावस्थायां निश्चयनयेन शक्ति रूपेण जिन इत्युच्यते ।
केवलज्ञानावस्थायां व्यक्ति रूपेण च । तथैव च परमब्रह्मादिशब्दवाच्यः स एव तदग्रे स्वयमेव
कथयति । निश्चयनयेन सर्वे जीवा जिनस्वरूपाः जिनोऽपि सर्वजीवस्वरूप इति भावार्थः ।
bhAvArtha — je bhavavanamAn anek dukhonI prAptinA hetubhUt karmarUpI shatrune jIte chhe
te jin chhe. te jin kevaLagnAnanI sAthe avinAbhAvI anantaguNamay chhe. indriyanA viShayothI
rahit, sva-AtmAthI utpanna, rAgAdi vikalpa rahit, paramAnand svabhAvI chhe, te pUrvokta
arhant ja paramAtmA chhe, parameshvar chhe. param-utkRuShTa anantagnAnAdi guNarUp mA arthAt lakShmI
jene chhe te param chhe, sansArIothI par eTale utkRuShTa chhe. AvA je param par te param
chhe, te-pUrvokta vItarAg sarvagna chhe. he jIv! te AtmasvabhAv chhe.
ahIn, pUrvokta kathit bhagavAn te ja sansAr-avasthAmAn nishchayanayathI shaktirUpe ‘jin’
kahevAy ane kevaLagnAn-avasthAmAn vyaktirUpe ‘jin’ chhe. te ja pramANe param-brahmAdi shabdathI vAchya
evA tene ja AgaL svayamev kathan karashe. – nishchayanayathI sarvajIvo jinasvarUp chhe, jineshvar sarvajIv
अनंत ज्ञानादि गुणरूप लक्ष्मीवाला आत्मा परमात्मा है । उसीको वीतराग सर्वज्ञ कहते हैं,
[जीव ] हे जीव, वही [परमपरः ] संसारियोंसे उत्कृष्ट है, ऐसा जो भगवान् वह तो व्यक्तिरूप
है, और [स आत्मस्वभावः ] वह आत्माका ही स्वभाव है ।
भावार्थ : — संसार अवस्थामें निश्चयनयकर शक्तिरूप विराजमान है, इसलिये
संसारीको शक्तिरूप जिन कहते हैं, और केवलीको व्यक्तिरूप कहते हैं । द्रव्यार्थिकनयकर जैसे
भगवान् हैं, वैसे ही सब जीव हैं, इस तरह निश्चयनयकर जीवको परब्रह्म कहो, परमशिव कहो,
जितने भगवान्के नाम हैं, उतने ही निश्चयनयकर विचारो तो सब जीवोंके हैं, सभी जीव
जिनसमान हैं, और जिनराज भी जीवोंके समान हैं, ऐसा जानना । ऐसा दूसरी जगह भी कहा
है । जो सम्यग्दृष्टि जीवोंको जिनवर जाने, और जिनेश्वरको जीव जाने, जो जीवोंकी जाति है,
वही जिनवरकी जाति है, और जो जिनवरकी जाति है, वही जीवोंकी जाति है, ऐसे महामुनि