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yogIndudevavirachita
[ adhikAr-2 dohA-198
तथा चोक्त म् — ‘‘जीवा जिणवर जो मुणइ जिणवर जीव मुणेइ । सो समभावि परिट्ठयउ
लहु णिव्वाणु लहेइ ।।’’ ।।१९७।। एवं चतुर्विंशतिसूत्रप्रमितमहास्थलमध्ये अर्हदवस्थाकथन-
मुख्यत्वेन सूत्रत्रयेण द्वितीयमन्तरस्थलं गतम् ।
अत ऊर्ध्वं परमात्मप्रकाशशब्दस्यार्थकथनमुख्यत्वेन सूत्रत्रयपर्यन्तं व्याख्यानं करोति ।
तद्यथा —
३२९) सयलहँ कम्महँ दोसहँ वि जो जिणु देउ विभिण्णु ।
सो परमप्प-पयासु तुहुँ जोइय णियमेँ मण्णु ।।१९८।।
सकलेभ्यः कर्मभ्यः दोषेभ्यः अपि यो जिनः देवः विभिन्नः ।
तं परमात्मप्रकाशं त्वं योगिन् नियमेन मन्यस्व ।।१९८।।
svarUp chhe, e bhAvArtha chhe. vaLI kahyun paN chhe ke — १‘‘जीवा जिणवर जो मुणइ जिणवर जीव मुणेइ । सो
समभावि परिट्ठियउ लहु णिव्वाणु लहेइ ।।’’ (artha — je jIvone jinavar jANe chhe ane jinavarane jIv
jANe chhe te samabhAvamAn sthit thaIne shIghra nirvANane pAme chhe.) 197.
e pramANe chovIs sUtronA mahAsthaLamAn arhant-avasthAnA kathananI mukhyatAthI traN
gAthAsUtrothI bIjun antarasthaL samApta thayun.
AnA pachhI paramAtmaprakAsh shabdanA arthanA kathananI mukhyatAthI traN dohAsUtra sudhI
vyAkhyAn kare chhe te A pramANe —
द्रव्यार्थिकनयकर जीव और जिनवरमें जातिभेद नहीं मानते, वे मोक्ष पाते हैं ।।१९७।।
इसप्रकार चौबीस दोहोंके महास्थलमें अरहंतदेवके कथनकी मुख्यतासे तीन दोहोंमें
दूसरा अंतरस्थल कहा ।
आगे परमात्मप्रकाश शब्दके अर्थके कथनकी मुख्यतासे तीन दोहा कहते हैं —
गाथा – १९८
अन्वयार्थ : — [सकलेभ्यः कर्मभ्यः ] ज्ञानावरणादि अष्टकर्मोंसे [दोषेभ्यः अपि ] और
सब क्षुधादि अठारह दोषोंसे [विभिन्नः ] रहित [यः जिनदेवः ] जो जिनेश्वरदेव हैं, [तं ] उसको
[योगिन् त्वं ] हे योगी, तू [परमात्मप्रकाशं ] परमात्मप्रकाश [नियमेन ] निश्चयसे [मन्यस्व ]
मान । अर्थात् जो निर्दोष जिनेन्द्रदेव हैं, वही परमात्मप्रकाश हैं ।
1 juo ShaTprAbhRut TIkA pRu. 342.