adhikAr-2 dohA-199 ]paramAtmaprakAsha [ 531
साे तं परमप्प-पयासु परमात्मप्रकाशसंज्ञं तुहुं त्वं कर्ता मण्णु मन्यस्व जानीहि जोइय
हे योगिन् णियमें निश्चयेन । स कः । जो जिणु देउ यो जिनदेवः । किंविशिष्टः । विभिण्णु
विशेषेण भिन्नः । केभ्यः । सयलहं कम्महं रागादिरहितचिदानन्दैकस्वभावपरमात्मनो यानि
भिन्नानि सर्वकर्माणि तेभ्यः । न केवलं कर्मभ्यो भिन्नः । दोसहं वि टङ्कोत्कीर्ण-
ज्ञायकैकस्वभावस्य परमात्मनो येऽनन्तज्ञानसुखादिगुणास्तत्प्रच्छादका ये दोषास्तेभ्योऽपि भिन्न
इत्यभिप्रायः ।।१९८।।
अथ —
३३०) केवल-दंसणु णाणु सुहु वीरिउ जो जि अणंतु ।
सो जिण – देउ वि परम – मुणि परम – पयासु मुणंतु ।।१९९।।
केवलदर्शनं ज्ञानं सुखं वीर्यं य एव अनन्तम् ।
स जिनदेवोऽपि परममुनिः परमप्रकाशं मन्यमानः ।।१९९।।
bhAvArtha — rAgAdi rahit chidAnand jeno ek svabhAv chhe evA paramAtmAthI bhinna
je sarva karmo chhe tenAthI ane TankotkIrNa gnAyak ja jeno ek svabhAv chhe evA paramAtmAnA je
anantagnAnasukhAdi guNo chhe temane AchchhAdan karanArA je doSho chhe tenAthI paN bhinna je
jinadev chhe tene he yogI! tun nishchayathI paramAtmaprakAsh jAN (paramAtmaprakAsh sangnAvALo
paramAtmA jAN.) e abhiprAy chhe. 198.
pharIne paN A kathanane draDh kare chhe —
भावार्थ : — रागादि रहित चिदानंदस्वभाव परमात्मासे भिन्न जो सब कर्म वे ही
संसारके मूल हैं । जगतके जीव तो कर्मोंकर सहित हैं, और भगवान् जिनराज इनसे मुक्त हैं,
और सब दोषोंसे रहित हैं । वे दोष सब संसारी – जीवोंके लग रहे हैं, ज्ञायकस्वभाव आत्माके
अनंतज्ञान सुखादि गुणोंके आच्छादक हैं । उन दोषोंसे रहित जो सर्वज्ञ वही परमात्मप्रकाश हैं,
योगीश्वरोंके मनमें ऐसा ही निश्चय है । श्रीगुरु शिष्यसे कहते हैं कि हे योगिन्, तू निश्चयसे
ऐसा ही मान वही सत्पुरुषोंका अभिप्राय है ।।१९८।।
फि र भी इसी कथनको दृढ़ करते हैं —
गाथा – १९९
अन्वयार्थ : — [केवलदर्शनं ज्ञानं सुखं वीर्यं ] केवलदर्शन, केवलज्ञान, अनंतसुख,