534 ]
yogIndudevavirachita
[ adhikAr-2 dohA-201
मोक्षपुरेश्वरम्’’ इत्यादि ।।२००।। एवं चतुर्विंशतिसूत्रप्रमितमहास्थलमध्ये परमात्माप्रकाश-
शब्दार्थकथनमुख्यत्वेन सूत्रत्रयेण तृतीयमन्तरस्थलं गतम् ।
तदनन्तरं सिद्धस्वरूपकथनमुख्यत्वेन सूत्रत्रयपर्यन्तं व्याख्यानं करोति तद्यथा —
३३२) झाणेँ कम्मक्खउ करिवि मुक्कउ होइ अणंतु ।
जिणवरदेवइँ सो जि जिय पभणिउ सिद्ध महंतु ।।२०१।।
ध्यानेन कर्मक्षयं कृत्वा मुक्तो भवति अनन्तः ।
जिनवरदेवेन स एव जीव प्रभणितः सिद्धो महान् ।।२०१।।
पभणिउ प्रभणितः कथितः । केन कर्तृभूतेन । जिणवरदेवइं जिनवरदेवेन । कोऽसौ
nAmothI yukta mokShapuranA Ishvar (svAmI) chhe (te jinadevane sarva ArAdhe chhe) 200.
e pramANe chovIsh sUtronA mahAsthaLamAn paramAtmaprakAsh shabdanA arthanI mukhyatAthI traN
gAthAsUtrathI trIjun antarasthaL samApta thayun.
tenA pachhI siddhasvarUpanA kathananI mukhyatAthI traN gAthAsUtra sudhI vyAkhyAn kare chhe. te
A pramANe —
bhAvArtha — rAgAdivikalpa rahit svasamvedanagnAnasvarUp dhyAnathI vishuddhagnAn, vishuddha-
एक हजार आठ नामों सहित वह मोक्षपुरका स्वामी उसकी आराधना सब करते हैं । उसके
अनंत नाम और अनंतरूप हैं । वास्तवमें नामसे रहित रूपसे रहित ऐसे भगवान् देवको हे
प्राणियो, तुम आराधो ।।२००।।
इसप्रकार चौबीस दोहोंके महास्थलमें परमात्मप्रकाश शब्दके अर्थकी मुख्यतासे तीन
दोहोंमें तीसरा अन्तरस्थल कहा ।
आगे सिद्धस्वरूपके कथनकी मुख्यतासे तीन दोहोंमें व्याख्यान करते हैं —
गाथा – २०१
अन्वयार्थ : — [ध्यानेन ] शुक्लध्यानसे [कर्मक्षयं ] कर्मोंका क्षय [कृत्वा ] करके
[मुक्तः भवति ] जो मुक्त होता है, [अनंतः ] और अविनाशी है, [जीव ] हे जीव, [स एव ]
उसे ही [जिनवरदेवेन ] जिनवरदेवने [महान् सिद्धः प्रभणितः ] सबसे महान् सिद्ध भगवान्
कहा है ।।